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शिक्षा क्षेत्र में छात्र की पसंद पहले

शिक्षा क्षेत्र में छात्र की पसंद पहले

मैं बारहवीं पीसीएम से कर रहा हूं। आगे एससीआरए में करियर बनाना चाहता हूं। इसकी परीक्षा पास करने के लिए किन विषयों का अध्ययन करना होगा। कृपया जानकारी दें।
उपेंद्र कुमार यादव, बलिया

स्पेशल क्लास रेलवे एप्रेंटिसशिप यानी एससीआरए की परीक्षा केंद्रीय लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) द्वारा आयोजित की जाती है। इसके जरिए रेल विभाग में जूनियर अफसरों की भर्ती की जाती है। इसके लिए अभ्यर्थी का बारहवीं (फिजिक्स, कैमिस्ट्री, गणित) पास होना जरूरी होता है। साथ ही अभ्यर्थी की उम्र सीमा परीक्षा के साल की जनवरी में 17 से 21 साल तक ही होनी चाहिए, हालांकि कुछ श्रेणियों में इसमें छूट मिलती है। परीक्षा में 200-200 अंकों के तीन पेपर होते हैं। प्रत्येक पेपर को हल करने के लिए दो घंटे का समय मिलता है। पहला पेपर  जनरल एबिलिटी टैस्ट का होता है, जिसमें सवालों के जरिए उम्मीदवार के सामान्य ज्ञान, अंग्रेजी और साइकोलॉजिकल टैस्ट का परीक्षण किया जाता है। दूसरा एग्जाम फिजिकल साइंस का होता है, जिसमें भौतिक और रसायन विज्ञान के सवाल पूछे जाते हैं। तीसरा पेपर गणित का होता है।

जो अभ्यर्थी परीक्षा के इस प्रथम दौर को पास कर लेता है, वह परीक्षा के दूसरे दौर में प्रवेश पाता है। लिखित परीक्षा पास करने वाले उम्मीदवारों का 200 अंकों का एक और एग्जाम होता है, जो पर्सनेलिटी टैस्ट कहलाता है। उसके बाद चयनित उम्मीदवारों का मेडिकल टैस्ट भी किया जाता है। सेलेक्शन के बाद आपको चार साल की एप्रेंटिसशिप के लिए जमालपुर के इंडियन रेलवेज इंस्टीटयूट ऑफ मैकेनिकल एंड इलेक्ट्रिकल इंजीनियर्स भेजा जाता है। इस दौरान  शुरुआती दो वर्षो तक 9100 रुपये प्रति माह का स्टाइपेंड मिलता है। उसके बाद के डेढ़ वर्ष तक यह स्टाइपेंड 9400 रुपये होता है और अंतिम 6 महीनों में यह बढ़कर 9700 रुपये प्रतिमाह हो जाता है।

इस ट्रेनिंग के सफलतापूर्वक होने के बाद आप भारतीय रेल सेवा में 18 महीनों के प्रोबेशन पीरियड पर बतौर असिस्टेंट मैकेनिकल इंजीनियर नियुक्त होते हैं। इस परीक्षा के बारे में अमूमन अक्टूबर के प्रथम माह में सूचना जारी की जाती है और जनवरी में इस परीक्षा का आयोजन होता है। इस बार यह परीक्षा 12 जनवरी 2014 को आयोजित की गई है।
 
मैंने इंटर पीसीएम से द्वितीय श्रेणी से पास की है। मैं बाइक डिजाइन में करियर बनाना चाहता हूं। कृपया मार्गदर्शन करें।
सिद्धांत रस्तोगी, सीतापुर

ऑटोमोबाइल डिजाइन का कोर्स करने के बाद आप इंडस्ट्रियल और ट्रांसपोर्टेशन सॉल्यूशन प्रदान करने वाली किसी डिजाइन सर्विस प्रोवाइडर टीम का हिस्सा बन सकते हैं। कुछ समय बाद आप किसी कंपनी के ऑटोमोटिव विभाग में ऑटोमोबाइल डिजाइन और इंजीनियरिंग सर्विस के विशेषज्ञ के तौर पर भी जुड़ सकते हैं। हां, यह जरूर है कि जापान, यूरोप या अमेरिका की अपेक्षाकृत भारत में यह क्षेत्र अभी थोड़ा नया है, इसलिए आपको शुरुआती तौर पर खुद को बाजार के अनुकूल करना होगा।

वैसे अब वर्चुअल डिजाइनिंग ने इस क्षेत्र को पहले से काफी आसान बना दिया है। पर एक बात और महत्वपूर्ण है कि ऑटोमोबाइल डिजाइन के क्षेत्र में आप सिर्फ कम्प्यूटर की मदद से ही डिजाइन पर पूरी तरह से निर्भर मत हों, आपको अच्छी स्केचिंग भी आनी चाहिए और आप 3डी आकृति और मॉडल में भी निपुण हों। वैसे इस क्षेत्र में कुछ संस्थान डिप्लोमा और डिग्री कोर्स भी कराते हैं।

मेरी बेटी अभी दसवीं क्लास में है। उसे भविष्य के लिए इसी साल नई स्ट्रीम को चुनना है। मेरा कहना है कि वह साइंस स्ट्रीम को चुने, जबकि मेरे पति और परिवार के अन्य लोग उसे आर्ट्स स्ट्रीम चुनने की सलाह दे रहे हैं। उनका कहना है कि वह आर्ट्स में अच्छा परफॉर्म कर सकती है। कृपया मेरा मार्गदर्शन कीजिए।
तूलिका महाजन

वैसे अगर हम आपके परिवार की इस बात पर गौर करें कि साइंस स्ट्रीम की पढ़ाई करने के बाद वैज्ञानिक और गणितज्ञ बनने वाले स्टूडेंट्स में पुरुषों की संख्या अधिक होती है, तो यह बात सही है। पर मेरा स्पष्ट मानना है कि ऐसा इसलिए नहीं होता कि लड़कियों में लड़कों की अपेक्षा योग्यता कम होती है, पर ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि हमारे समाज में लिंगभेद बहुत है। परिवार, समाज और संस्थान लड़कियों को शुरू से ही मैथ्स, साइंस और टेकनोलॉजी जैसे विषयों से दूर रखते हैं।

यह प्रवृत्ति सिर्फ भारत में ही नहीं, अमेरिका जैसे विकसित देशों में भी है। हालांकि अमेरिका में टीचिंग के क्षेत्र में 35 प्रतिशत महिलाएं हैं, पर  जब बात साइंस और  टेक्नोलॉजी की आती है, तो आकंड़ा गिरकर बीस प्रतिशत ही रह जाता है। यद्यपि इसके बावजूद जब हम डॉक्टरल डिग्री की बात करें तो यह प्राप्त करने वाली महिलाओं की संख्या पुरुषों से अमूमन दोगुनी देखी गई है।

वैसे एम्प्लाई के तौर पर नौकरी देने वाले अधिकांश एम्प्लॉयर, कंपनियां और संस्थान दावा तो करते हैं कि वे नौकरी देते समय महिला-पुरुष का फर्क नहीं देखते हैं, पर अमूमन व्यावहारिक तौर पर यह देखने को मिलता है कि एक समान योग्यता रखने वाले महिला और पुरुष केंडिडेट में से पुरुष केंडिडेट को वरीयता मिल जाती है।

मेरा स्पष्ट मानना है कि यह भ्रम है कि परिवार वाली महिलाएं ज्यादा छुट्टियां लेती हैं या फिर वे ज्यादा देर तक काम नहीं करती हैं, क्योंकि आज के युग में कोई भी ऐसा फील्ड नहीं है, जहां महिलाएं जिम्मेदारी निभाने या वर्क प्रेशर में काम करने की क्षमता में पुरुषों के पीछे हों।

जहां तक आपकी बेटी की बात है, तो उसे कौन सा विषय चुनना है, इसका फैसला मेरे अनुसार इस आधार पर होना चाहिए कि उसे कौन सा सब्जेक्ट पसंद है और उसकी रुचि किस विषय में है। इस निर्णय में लड़कियों में योग्यता की कमी की पारंपरिक सोच को बिल्कुल भी आड़े नहीं आने देना चाहिए। इसलिए अपनी बेटी से इस अहम मुद्दे पर बात कीजिए और वह जो स्ट्रीम चुनना चाहती है, उसे उसके लिए प्रोत्साहित कीजिए। वैसे महिलाएं पुरुषों की अपेक्षा बढ़िया मल्टी टास्कर होती हैं, यह बात भी महत्वपूर्ण है।

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