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उत्तराखंड की आपदा ने पूरे देश को दिया था झकझोर

उत्तराखंड की आपदा ने पूरे देश को दिया था झकझोर

शिव की धरती केदारनाथ में 2013 के मध्य में आई आपदा से संहार और तबाही का जो तांडव मचा उसने सिर्फ उत्तराखंड को ही तहस-नहस नहीं किया, बल्कि पूरे देश को रुला दिया और दुनिया को प्रकृति की ताकत के समक्ष अपनी क्षमता को देखने का एक और दर्पण भी दे दिया।

केदारनाथ में आपदा 16 और 17 जून की रात ऐसे वक्त पर आई, जब यात्रा चरम पर थी और श्रद्धालु बड़ी संख्या में शिव दर्शन के लिए केदारनाथ में थे या उसके करीब थे। मंदिर के ऊपरी हिस्से में बने विशाल ताल के टूटने से यह आपदा आई, जिसने मंदिर परिसर में तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए बने कई आवासीय भवनों को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया।

जल प्रलय ने हजारों लोगों की एक झटके में जान ले ली। मंदिर के रास्ते में गौरी चट्टी, रामबाडा, गौरीकुंड और सोन प्रयाग आदि स्थानों पर भी जमकर तबाही हुई और जल प्रलय के मार्ग में आए सभी कस्बे इसमें समा गए। आपदा के कारण असंख्य लोग मारे गए और हजारों पशु खासकर यात्रा मार्ग पर चलने वाले घोड़े प्रलय की भेंट चढ़ गए।

केदारनाथ पहुंचने के लिए वाहन का आखिरी पड़ाव गौरीकुंड है और इससे करीब पांच किलोमीटर पहले सोन प्रयाग है। सोन प्रयाग से रास्ता खराब है और गौरीकुंड पहुंचने में बहुत समय लगता है इसलिए कई यात्री सोन प्रयाग से ही पैदल चलना शुरू कर देते हैं। गौरीकुंड, रामबाडा और गौरी चट्टी होते हुए यात्री करीब 14 किमी की पैदल यात्रा तय कर केदारनाथ पहुंचते हैं। रात को हो सकता है कि पैदल मार्ग पर भी शायद यात्री रहे हों।

जल प्रलय से यह पैदल मार्ग पूरी तरह ध्वस्त हो गया और केदारघाटी ही उजाड़ बन गई। असंख्य यात्री केदारनाथ में फंसे रहे, जिन्हें सेना ने विशेष अभियान चलाकर दस दिन के भीतर फाटा, गुप्तकाशी, गोचर और देहरादून पहुंचाया। तबाही में असंख्य लोग तबाह हो गए और कई लोग यात्रा के बाद फिर कभी अपनों से नहीं मिल सके।

उत्तराखंड की तबाही का मंजर सिर्फ केदारनाथ तक ही सीमित नहीं था। भारी बारिश के कारण तबाही राज्य में स्थित शेष तीन धामों बदरीनाथ, गंगोत्री और यमनोत्री में भी हुई, लेकिन वहां लोग मारे नहीं गए। कई दिनों तक जरूर फंसे रहे। यही हाल सिखों के पवित्र स्थल हेमकुंड साहेब का भी थे, जहां बड़ी संख्या में यात्री फंसे रहे। बदरीनाथ में यात्रा मार्ग भूस्खलन के कारण अवरुद्ध हो गया था और यात्रियों के लिए गोविंदघाट से निकलना चुनौती बन गया था इसलिए सेना का केदारनाथ से यात्रियों को निकालने का अभियान गोविंदघाट में उसी स्तर पर जारी रहा।

गंगोत्री और यमनोत्री में फंसे यात्रियों को निकालने का काम उत्तकाशी के मातली से अर्ध सैनिक बलों ने किया। सेना के दिनरात चले अभियान के बाद उत्तराखंड सरकार ने 29 जून को कहा कि सभी यात्रियों को निकाल लिया गया है। सैन्य अभियान के आखिरी दिन एक दुखद घटना हुई। केदारनाथ में सैनिकों को लेने जा रहा एक हेलीकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त हो गया, लेकिन उसके बाद भी सेना के जवानों ने रास्ते में फंसे यात्रियों को निकालने के अभियान चलाया। यात्रियों के केदारनाथ के लिए पैदल मार्ग पर ज्यादा फंसे होने की संभावना जताई जा रही थी। इस मार्ग पर कोई यात्री तो नहीं मिला, लेकिन रास्ते में फंसे घोड़े-खच्चर कई दिन बाद जरूर मिले।

यात्रियों के शव पूरे रास्ते में जगह-जगह बिखरे पड़े थे। यह कितनी भयावह त्रासदी रही होगी इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि केदारनाथ से करीब दो किलोमीटर दूर हरिद्वार तक शव बहकर आए और वहां प्रशासन ने 40 से ज्यादा शव मिलने की पुष्टि भी की। बरसात के दिनों जल प्रलय उत्तराखंड में आम बन गई है, लेकिन 2013 में इसने जो तांडव किया उसे उत्तराखंड ही नहीं पूरा देश शायद ही कभी भूल पाएगा। मंदाकिनी, पिंडर, अलकनंदा, भागीरथी सहित सभी छोटी बड़ी नदियां उफान पर रहीं और उनके रास्ते में जो भी आया सब कुछ जल प्रलय में समा गया।

सड़क, पुल, मकान, मंदिर, पेड़-पौधे, मिट्टी, पत्थर सब कुछ जल प्रलय की भेंट चढ़ गए। उत्तराखंड के कई इलाके वीरान बन गए। नदी तट पर बसे नगरों को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ। इस नुकसान को देखते हुए राज्य सरकार ने घटना के कुछ ही समय बाद न्यायालय के नदी तट से आधा किमी के दायरे में आवासीय निर्माण कार्य नहीं करने के आदेश को क्रियान्वित किया। आपदा के आकलन में कई महीने लग गए। सरकार के लिए तत्काल इसका आकलन कठिन हो गया था।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने आपदा के तुरंत बाद राज्य के लिए एक हजार करोड़ रुपए की राहत की घोषणा की। संसद में इस मुद्दे पर विशेष चर्चा हुई और राज्य सरकार को बडे स्तर पर राहत पैकेज दिए गए। मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने नौ दिसंबर में स्वयं कहा है कि केंद्र सरकार ने उत्तराखंड के पुनर्निर्माण के लिए 7,376 करोड़ रुपए के पैकेज की घोषणा की है। उन्होंने कहा कि इस हादसे में 4,045 व्यक्ति लापता हुए हैं और पूरी खोजबीन के बाद 3,180 लोगों के मृत्यु प्रमाण पत्र जारी किए गए हैं।

उन्होंने कहा कि आपदा में 16,016 मकान क्षतिग्रस्त हुए हैं, जिनके पुनर्निर्माण के लिए 72 करोड़ रुपए की राशि जारी की गई है। उन्होंने कहा कि इस आपदा में 22 हजार 86 परिवार प्रभावित हुए हैं और 12 हजार 421 हेक्टेयर भूमि पर फसलों को नुकसान हुआ है। आपदा से हुए नुकसान के बारे में जारी एक अन्य आंकड़े में राज्य सरकार ने कहा है कि आपदा में 5,700 से अधिक लोग मारे गए और 365 घर पूरी तरह से ध्वस्त हुए। आपदा काल के कुछ ही समय बाद आए एक सरकारी बयान में कहा गया कि आपदा की चपेट में 4,200 गांव आए।

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