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संकट और सुलह

श्मीर के रायपाल और राय सरकार के कइयों से कश्मीर में सुलगती आग बुझ सकेगी, ऐसी हमें उम्मीद करनी चाहिए। श्रीअमरनाथजी श्राइन बोर्ड को जमीन दिए जाने से पैदा हुआ विवाद कश्मीर की शांति प्रक्रिया को काफी दूर तक प्रभावित कर गया है और यहां से सामान्य स्थिति तक पहुंचने में काफी सूझबूझ और दूरंदेशी की जरूरत होगी। वैसे यह विवाद खड़ा भी सूझबूझ और दूरंदेशी की कमी से ही है और तमाम राजनैतिक शक्ितयों ने संकीर्णता और गैरजिम्मेदारी का परिचय दिया है। एक तो कश्मीर में अलगाववादी तत्व ऐसे किसी मुद्दे की तलाश में ही थे जिससे वे संगठित और शक्ितशाली हो सकें। पूर्व रायपाल ने जाने-अनजाने श्राइन बोर्ड के मामले को ऐसा बना दिया जिससे कि उसके सांप्रदायिक होने का संदेह हो, ऐसे में अलगाववादियों ने इस मामले को हाथोंहाथ ले लिया। राय सरकार ने भी इसे जल्दी खत्म करने की फुर्ती नहीं दिखाई और पीडीपी ने सरकार का हिस्सा होते हुए भी गैरजिम्मेदाराना रुख अपनाया क्योंकि उसे अपनी जमीन खिसकने का अंदेशा नजर आया। सब कुछ मिलाकर घाटी में ऐसा व्यापक संकट आया जसा 1े बाद कभी देखने को नहीं मिला था। जम्मू-कश्मीर अत्यंत संवेदनशील इलाका है और यहां सारी राजनैतिक ताकतों को फूंक-फूंक कर कदम रखने की जरूरत है, लेकिन घटनाक्रम ऐसा चला कि सारे उग्रवादियों की लिखी स्क्रिप्ट पर चल पड़े। एक ओर कश्मीरी उग्रवादी इस बहाने मुखर और शक्ितशाली हो रहे हैं दूसरी ओर हिंदूवादी गुट इस घटना को राजनैतिक मुद्दा बनाने पर उतारू हैं। इस तरह दोनों एक-दूसरे को मजबूत बना रहे हैं और इनके बीच मध्यमार्गी, उदारवादी ताकतें नुकसान को कम करने की कोशिश कर रही हैं। वर्तमान रायपाल एनएन वोहरा को इसी उम्मीद में जम्मू-कश्मीर लाया गया था कि वे गृह सचिव की हैसियत से कश्मीरी गुटों से बातचीत के सूत्रधार रहे हैं, इसलिए कश्मीर में संवाद और शांति का माहौल बनाने में वे उपयोगी होंगे। उनके पूर्ववर्ती रायपाल सैनिक अधिकारी रहे हैं और इसकी वजह से कई कश्मीरी समूह उन्हें संदेह से देखते थे। यह विवाद भी उन्हीं के कार्यकाल में पनपा और वोहरा के कार्यकाल की शुरुआत ही इस विवाद के निपटने से हुई है। फिर भी हम उम्मीद करें कि कश्मीर में जो सफलता की रोशनी दिखी है, यह विवाद उसे यादा धूमिल नहीं कर पाएगा।

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  • Web Title: संकट और सुलह