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गंगा की अविरल धारा का सही अर्थ

गंगा की पवित्रता, अविरल धारा और उसके कर्मकाण्डीय महत्व के बारे में आज चारों ओर कुछ धार्मिक संगठनों द्वारा जो नकली चिंता प्रकट की जा रही है, हो सकता है इसी में से एक दिन नदियों की रक्षा का असली बोध पैदा हो । जहां तक गंगा की ‘अविरल धारा‘ं का प्रश्न है इसे सबसे पहले हरिद्वार से अनेक नहरें निकाल कर खंडित किया गया है। हर की पैड़ी का ब्रह्म कुण्ड भी मात्र एक नहर के पूर्ववर्ती हिस्से जैसा बनकर रह गया है। गंगा की अविरल धारा को खंडित करने वाली हरिद्वार की नहरों का कभी विरोध नही किया गया। उन नहरों ने प्रदेश और देश को अन्न की समृ िदी है। हरिद्वार से जाने वाली दर्जन भर नहरों का जल कभी प्रयाग के संगम पर नहीं पहुंचता, गंगा सागर तक पहुंचने का तो प्रश्न ही नहीं। ‘नहरीकरण‘ पर विचार किया जाए तो हरिद्वार से आगे गंगा कहीं है ही नहीं। आगे का पानी नालों-पनालों और बिजनौर की छोटी नदियों का पानी है। गंगा तो मेरठ मुजफ्फरनगर के खेतों में समा जाती है। अविरल धारा का आग्रह करने वाले लोग इस तथ्य और सत्य पर कभी विचार नहीं करते। गंगा हरिद्वार में पहले खंडित हुई है और हो रही है। कानपुर में वह नरक की नदी से भी बदतर हालत में है। गंगा को प्रदूषित करने वाले कानपुर के उद्योगों को हटाने की और गंगा को पवित्र बनाने की मुहिम कभी नही चलाई गई। जबकि उद्योग शून्य 13 जिलों के उत्तराखण्ड में गंगा प्राकृतिक भूस्खलन इत्यादि से ही प्रभावित होती है, शहरी प्रदूषण उसके मुकाबले नगण्य है। गोमुख से उत्तरकाशी तक की गंगा बरसात के बाद पूरे भारत में अपेक्षाकृत पवित्र और निर्मल है। ‘अविरल धारा’ के स्थान पर आज ‘अविरल प्रवाह’ की बात होनी चाहिए। जब ‘नहरीकरण’ से गंगा की अविरल धारा खंडित और प्रभावित नहीं मानी गई तो पहाड़ों में विद्युत उत्पादन के लिए किए जाने वाले सुदृढ़-सुन्दर और स्वच्छ ‘टनलीकरण’ से गंगा की अविरल धारा को खंडित कैसे माना जा रहा है? टनल यानी कि सुरंग मार्ग भैरव घाटी से धरासू के मध्य ऐसी जगहों पर बनाए गए हैं और प्रस्तावित हैं, जो जनशून्य है। तीर्थ स्थलों पर सब जगह गंगा अपने मूल जल और प्रवाह के साथ मौजूद है। फिर प्रगति का अन्ध विरोध क्यों?ड्ढr अकेले मनेरी भाली (फेज एक और दो) प्रतिदिन देश और प्रदेश को करोड़ों रुपए दे रहे हैं।ड्ढr अविरल धारा के प्रसंग में माइथॉलाजिकल इतिहास पर नजर डालना जरूरी है। वामन अवतार विष्णु के विराट रूप के उस चरण की धोवन गंगा के नाम से जानी जाती है जो त्रेलोक्य को नापते हुए ब्रह्मा के सामने पहुंचा था। ब्रह्मा को विष्णु चरणाविन्द के प्रक्षालन से जो जल प्राप्त हुआ उसे उन्होंने एक विशेष कमंडल में युगों-युगों तक सुरक्षित रखा। तब भी अविरल धारा का प्रश्न नहीं उठा। इसके बाद राजा सगर के पुत्रों की लाशों को ठिकाने लगाने के लिए भगीरथ कई युगों की कठोर तपस्या के बाद गंगा को ब्रह्मा के कमंडल की कैद से मुक्त कराके पृथ्वी पर लाये। लेकिन बीच में कई युगों तक गंगा शिव की जटाओं में अटकी रही। तब भी अविरल धारा का प्रश्न नहीं उठा। अगर हिमालय की उपत्यकाओं को शिव की जटा मान लिया जाए तो गंगा को पर्वतीय क्षेत्र की गुफाओं और सुरंगों के बीच से गुजरने की पुरानी आदत है। इस अंतर्बाह्य यात्रा से गंगा की पवित्रता जब पहले नष्ट हुई नहीं मानी गई तो आज इन दाढ़ी बढ़ाये लोगों के कहने से उसे अपवित्र कैसे मान लिया जाए? पानी का स्वभाव है कि वह प्रवाह से ही पवित्र होता है। आंशिक गतिरोध यदि फिर से प्रवाह पकड़ लेता है तो पानी की स्वच्छता पूर्ववत हो जाती है। टिहरी बांध को भरने के लिए भी गंगा पूरी तरह बन्द कभी नही की गई । जितने दिन वह झील भरने के लिए आंशिक रूप में जितनी रोकी गई, उसके बाद निरंतर प्रवाह से स्वत: वह क्षतिपूर्ति हो गई।ड्ढr आज लोहारी नाग परियोजना से स्थानीय गांव के लगभग नौ सौ युवकों को ऐसा रोजगार मिला हुआ है जिससे वे दिन-ब-दिन आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहे हैं। भंगेली को जिले का सबसे पिछड़ा गांव माना जाता है और जहां जाने का रास्ता सबसे खतरनाक है- उस भंगेली जैसे पिछड़े गांवों को परियोजना के कारण सड॥क, स्कूल और ‘बारात घर’ नसीब हुए हैं। यह योजना ऐसी जगह मूर्त रूप ले रही थी जहां1े डबरानी भूस्खलन और बाढ़ का उद्गम है। इस योजना के कारण वहां भविष्य के भूस्खलनों पर भी नियंत्रण हो जाएगा। गंगा को केवल मुदोर्ं की और मोक्ष की नदी न बनाया जाए बल्कि उसे मनुष्य की दरिद्रता दूर करने वाली, प्रकाश फैलाने वाली, खेतों को हरा-भरा बनाने वाली नदी भी बने रहने दिया जाए। अन्यथा गंगा बचाओ आन्दोलन एक धार्मिक वितंडा बनकर रह जायेगा। महर्षि व्यास ने महाभारत में कहा है कि- मनुष्य से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है। सारी प्रकृति मनुष्यों के लिए रची गई है उसके गुण-दोषों को समझकर मनुष्य को उसकी रक्षा करनी चाहिए और उसमें अनुकूल परिवर्तन करते रहने चाहिए। गुफाओं का रुपान्तरण हमने मकानों में कर लिया है। जंगलों को हमें फिर से अपने बीच स्थान देना है अन्यथा जनसंख्या का जंगल स्वस्थ नहीं रह पायेगा। नदियों के साथ-साथ पानी की एक एक बूंद की सुरक्षा और स्वच्छता के बारे में भी हमें सोचना है। गंगा के अविरल प्रवाह और उसकी स्वच्छता के बारे में धार्मिक अन्धविश्वास और राजनीतिक नजरिये से नहीं सोचा जाना चाहिए। गंगा पर जितना अधिकार धार्मिकता का है उतना ही किसानों और स्थानीय लोगों का भी है। गंगा की समस्या को शु समाज-वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाना चाहिए। इसमें संदेह नहीं की किसी भी नदी को सबसे पहले उद्गम पर ही बचाना चाहिए। जहां आज गंगा का उद्गम गोमुख है, वह प्राचीन काल का गोमुख नहीं है। प्राचीन काल का गोमुख गंगोत्री स्थित ‘सूर्य कुण्ड‘ है। जहां गंगा की धाराएँ प्रपातों के रूप में शिव की जटाओं से निकलती प्रतीत होती है। उन्हीं धाराओं के मध्य शिला पर बना प्राकृतिक गाय का मुख दिखायी देता है। इस सूर्य कुण्ड वाले असली गोमुख से आज का गोमुख लगभग उन्नीस किलोमीटर पीछे चला गया है। आज जरूरत है कि भोजपत्र और पद्म के वृक्षों का गंगोत्री क्षेत्र में प्रतिवर्ष रोपण किया जाए तो दस-बीस वर्षों में हिमाच्छादन को गंगोत्री तक टिकाऊ बनाया जा सकता है। भगीरथ शिला तक बारह महीनों का हिमाच्छादन बना रहे तो गंगा इस पृथ्वी पर कायम रह सकेगी। यह तभी सम्भव होगा जब बारह वर्ष तक गंगोत्री से आगे लोगों का आना-जाना सर्वथा प्रतिबन्धित कर दिया जाए।ड्ढr लेखक हिन्दी के प्रतिष्ठित कवि हैं

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