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रोटी, शेयर और मकान

इकॉनमी को वित्त मंत्रालय के गुलाबी चश्मों से ही देखने की कसम न खाई हो तो कोई भी समझ सकता है कि बाजारों में इस वक्त कत्लेआम का नजारा है। इशरा सिर्फ शेयर बाजार की तरफ नहीं है जिसमें तेजी के बैल मंदी के भालुओं के सामने पड़े जख्म सहला रहे हैं और जहां अंतरराष्ट्रीय निवेशकों ने भगदड़ के डेढ़ दशक के रिकॉर्ड तोड़ डाले हैं। इशारा नोन-तेल-लकड़ी के उन बेसिक बाजारों की तरफ भी है जहां महंगाई और ब्याज दर नाम के दो पाटन हैं और जहां उपभोक्ता नाम के जीव के साबुत बचने की कोई गुंजाइश नहीं बची है। सेनसेक्स अगर 20 हाारी बुलंदियों से फिसलकर 12 हाारी तलहटियों में छटपटाए तो इसमें सीधा नुकसान निवेशकों का है। लेकिन चूंकि मु़ल्क में निवेशकों की संख्या बहुत ज्यादा नहीं और चूंकि एक बड़ा वर्ग अभी उपभोग की निचली सीढ़ी पर ही अटका हुआ है, सेनसेक्स की गिरावट आम आदमी की मायूसी नहीं बन पाती। लेकिन साढ़े 11 फीसदी के आसपास खड़ी मुद्रास्फीति और 12 प्रतिशत के नजदीक खड़ा होमलोन का ब्याज निम्न और मध्यमवर्ग की जिंदगी को सीधे छूने वाली घटनाएं हैं। वे देखते-देखते हमार तरक्की के अफसानों को शोकगीतों में बदल सकती हैं। रोटी, कपड़ा और मकान की जद्दोजहद में जुटे लोगों की उदासी इस खबर से बढ़ी है कि वर्ष 2005 से 2008 के बीच होमलोन ब्याज दर 3 फीसदी बढ़ चुकी है और ईएमआई में औसतन 28 प्रतिशत का क्षाफा हुआ है। स्टेट बैंक, पंजाब नेशनल बैंक और यूनाइटेड बैंक के बाद एचडीएफसी और आईसीआईसीआई ने भी ब्याज में वृद्धि का ऐलान कर दिया है। क्रेडिट कार्डो के इस्तेमाल को मजबूर लोगों के लिए ब्याज दर औसतन 36 फीसदी से बढ़कर 42 फीसदी सालाना हो गई है। आटो लोन और दूसर कंयूमर लोन बाजार में भी यही आलम है। बेशक, मारकाट के इस सिलसिले की जड़ हिंदुस्तान में नहीं, 140 डॉलर प्रति बैरल पर खड़े विश्व तेल बाजार में है। लेकिन देखना यह है कि जो सरकार वोटर किसान को बचाने के लिए, सब तर्को को ताक पर रख, हाारों करोड़ रुपये के राहत पैकेा ला सकती है, वह वोटर उपभोक्ता के आंसू कैसे पोंछती है। सस्ते मकान और सस्ते नोन-तेल-लकड़ी को तरसते उपभोक्ता वोटर के लिए वह क्या पैकेा लाती है। फिलहाल तो उसके लिए जड़ आर्थिक दलीलों और पेट काटने की नसीहतों के अलावा कुछ नहीं है।ं

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  • Web Title: रोटी, शेयर और मकान