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सच्चा तीर्थाटन

पहाड़ी इलाकों में ‘तीर्थ यात्रियों’ द्वारा उत्पात और लोकल लोगों के साथ मारपीट की खबर पढ़ते समय संयोगवश कानों में पड़ रही थी सुबह की पवित्र वाणी ‘आसा दी वार’ से बाबा नानक की यह प्रासंगिक पंक्ित- ‘सीस निवाइअै किआ थीअै जा रिदै कुसुधे जाई।’ यानी मन अगर गुरु परमेश्वर द्वारा बताये मार्ग की बजाय कुमार्ग पर चल रहा हो तो ईश्वर के आगे शीश निवान का क्या लाभ। उत्पाती भक्तों और तीर्थयात्रियों के व्यवहार पर खरा उतर रहा था गुरुवाणी का एक-एक शब्द। साथ ही याद आ रहा था गये साल में कुछ असहनशील कांवड़ियों का मिलता-जुलता व्यवहार। व्यस्त जीवन में से समय और पैसा निकाल कर तीर्थ किया, स्नान किया, कुछ दान-पुण्य भी किया। पर बीच रास्ते में बेवजह किसी से उलझ गये, गालीगलौज और मारपीट पर उतर आये। समझ लेना चाहिए कि घर से निकले तो जरूर, पर धर्म के मार्ग पर बढ़े नहीं, खड़े ही रहे। धर्मविरोधी कृत्य से धर्म की सारी कमाई शून्य कर ली- ठीक उसी तरह जैसे हाथी ने स्नान तो किया पर फिर शरीर पर धूल डाल ली। जैसा गुरु जी फरमाते हैं- तीरथ बरत अरु दान करि मन मै धरहि गुमान॥ नानक निहफल जात तिह जिउ कुंचर इसनानु॥’ गुरु अमरदासजी ऐसे तीर्थयात्रियों के बारे में तो और भी सख्त टिप्पणी करते हैं- नावण चले तीरथी मनि खोटै तनि चोर। तीर्थाटन धर्म की लंबी यात्रा का महज एक पहलू, एक पड़ाव है। न यह मौजमस्ती है न पिकनिक जैसा आज कुछ लोगों ने इसे बना लिया है। खासकर पहाड़ी तीर्थाटन करने वाल कई बड़े बुजुर्ग आज भी यात्रा और देवदर्शन का आधा पुण्य पालकी और खच्चर वालों समेत ऐसे हर लोकल व्यक्ित को देते हैं जिनकी मदद से वे हजारों फुट ऊंचे देवालय तक पहुंचे।ड्ढr धार्मिक दिखाई देना उतना महत्व नहीं रखता जितना आचरण से धार्मिक होना। जपुजी में बाबा नानक का कथन है- विणु गुण कीते भगति न होइ।

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