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ब्लॉग वार्ता : आस्था से लड़ता साईब्लॉग

यह कोई साईं कृपा से चलने वाला ब्लॉग नहीं, साईंस से साई लेकर साईब्लॉग बना है। न ही ब्लॉगर अयातुल्ला खुमैनी के खानदान के हैं। बनारस के अरविंद मिश्रा बताते हैं कि उन्होंने जनेटिक्स की दुनिया की नवीनतम खोज जीनोग्राफी के जांच का फायदा उठाया है।इससे आपको पता चल जाता है कि आपके पुरखों का उद्गम कहां है और अब आपके साथ पुरखों की वंश वेली इस धरा पर कहां-कहां बनी हुई है। अरविंद मिश्रा ने नेशनल ज्योग्राफी से साढ़े चार हाार में जब जीनोग्राफी किट मंगा कर खुद से जांच की तो उनकी वंश वेली का आखिरी सिरा ईरान में जा कर खुल गया। डीएनए किट का नतीजा बताता है कि इनके पुरखे चालीस हाार साल पहले ईरान के आस-पास के थे। कहते हैं कि कहीं मैं खुमैनी के खानदान का तो नहीं। विज्ञान ब्लॉगिंग डीएनए की जटिल बातों को सरलतम अंदाज में पेश कर रहा है। बस आपको टाइप करना होगा ँ३३स्र्:्र्िरं२्रूऋ्रं१५्र.िु’२स्र्३.ू। यहां अरविंद मिश्रा हिंदी में विज्ञान पर लोकप्रिय और निजी लेखों का एक ऐसा खजाना बनाते मिल जाएंगे जहां आस्था और विज्ञान के सवालों के जवाब भी हैं। साई ब्लॉग मंगल ग्रह पर भेजे गए फिनिक्स की कथा मिथकों के सहार कहता हुआ दिलचस्पी पैदा करता है। बताता है कि अरब और यूनान की दंत कथाओं का यह पक्षी सदियों तक जीता है और इच्छा मृत्यु से समाप्त कर राख में बदला जाता है। एक दिन इसी राख से जी उठता है। इसके बाद बताते हैं कि फिनिक्स मंगल ग्रह पर किन-किन चीजों को खोज रहा है। बात कई मसलों से गुजरती है। क्लोन कुत्ते से लेकर सांप की कहानी है। मिश्रा बताते हैं कि कैसे बनारस में कॉमन वुल्फ सांप को लोक करैत समझ कर मार देते हैं। जबकि अपनी आदत से मानव साहचर्य में रहने वाला यह सांप विषहीन होता है। अरविंद ने फोन पर बताया कि जून से अक्तूबर के बीच भारत में 30,000 लोग सांपों के काटने से मर जाते हैं। इनमें से ज्यादातर मौतें सदमे और झाड़ फूंक में समय बार्बाद करने के कारण होती हैं। इन्हीं बेचैनियों ने अरविंद को ब्लॉग पर सक्रिय कर दिया है। साप्ताहिक हिन्दुस्तान, धर्मयुग के जमाने से विज्ञान कथाओं यानी साइंस फिक्शन लिखने वाले अरविंद कहते हैं कि डिाीटल दुनिया एक हकीकत है और यह ब्लॉग उस हकीकत की एक मिसाल। इन सभी जानकारियों के अलावा साईब्लॉग आस्था और विज्ञान के सवाल से भी दो चार होता है। आस्था के भरोसे रहते तो अब तक गुफाओं में ही हमारा वास होता। विज्ञान और तर्क शक्ित के सहार हम यहां तक पहुंचते हैं। आस्था और विज्ञान के सवाल को आम जुबान में समझाते हुए अरविंद मिश्रा कहते हैं कि डार्विन ने समझा दिया कि आदमी वैकासिक प्रक्रिया से अवतरित हुआ न कि दैवी कृपा। चर्च से लेकर तमाम आस्थावादियों ने डार्विन का विरोध तो किया लेकिन विरोध की आवाज शांत पड़ गई। लेकिन आज भी हिंदुस्तान में कुछ बाबा लोग सृजनवाद की ढोल पीट रहे हैं। आखिर अज्ञान के प्रसार से उन्हें क्या मिलेगा? जबकि कई धर्मो की मान्यता यही है कि खुद भगवान को भी ज्ञान का मार्ग सबसे प्रिय है। विज्ञान पर एक कम्युनिटी ब्लॉग है तस्लीम। कम्युनिटी ब्लॉग में कई लोग मिलकर लिखते हैं। अलग-अलग दिन कम्युनिटी के अलग-अलग सदस्य। ऐसे ब्लॉग की खासियत यह होती है कि वे किसी एक व्यक्ित के शुरुआती उत्साह के ठंडा पड़ने से ठहर नहीं जाता। इसका पता है ँद्धह्लह्लश्चज्ह्लड्डह्यद्यन्द्व.ड्ढद्यoद्दह्यश्चoह्ल.ष्oद्व ञ्ज््नस्रुञ्रू उर्दू का शब्द नहीं है बल्कि स्थानीय मुद्दों पर जागरूकता फैलाने वाले वैज्ञानिकों की टीम के अंग्रेजी नाम का संक्षिप्त रूप है। लखनऊ के जाकिर अली इसके कर्ताधर्ता हैं। इसका मकसद है कि आप अपने आसपास की प्रकृति और विज्ञान को कितना समझते हैं। तस्वीरों के जरिए बकायदा विज्ञान पहेली चलती है। मादा कोयल की तस्वीर जब लोग नहीं पहचान पाए तो ब्लॉगर ने खुद बता दिया कि सफेद बुंदिया जिस पर होंगी वह मादा कोयल और जो बिल्कुल काला होगा नर कोयल होगा। साधारण सी इस पहेली से वे इस धारणा को तोड़ते भी दिखते हैं कि कोयल हमेशा काली ही हेाती है। इसका दोष वे कुछ हद तक उस साहित्य को भी देते हैं जो काली कोयल का महिमा मंडन करता रहा। वे इसे लेकर चिंतित भी हैं कि भावी पीढ़ियां पता नहीं इस कोयल को पहचानेगी भी या नहीं। तस्लीम की पोस्ट में लखनऊ की गंदी हो रही गोमती नदी को लेकर चिंता दिखाई पड़ती है तो उसकी सफाई के लिए जनता के स्तर पर हो रही कोशिशों के प्रति उत्साह भी। लेखक का ब्लॉग है ठ्ठड्डन्ह्यड्डस्र्ड्डद्म.ड्ढद्यoद्दह्यश्चoह्ल.ष्oद्वं

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