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भारत-चीन संबंधों के लिए उतार-चढ़ाव का रहा साल

भारत-चीन संबंधों के लिए उतार-चढ़ाव का रहा साल

इस साल भारत और चीन के बीच रिश्ते बुलंदियों पर भी पहुंचे और नई गिरावट के भी शिकार हुए। चीनी सैनिकों की घुसपैठ से दोनों देशों के बीच रिश्तों में गिरावट आई, तो बार बार सीमा पर तनातनी दूर करने के लिए दोनों देशों के बीच करार भी हुआ।
      
इन तनावों से इतर दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों ने एक दूसरे देश की यात्रा की, जो छह दशक के लंबे काल में इस तरह का पहला मौका था। चीनी प्रधानमंत्री ली क्विंग ने इस साल अप्रैल में भारत की यात्रा की। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अक्टूबर में यात्रा की।
     
इससे पहले 1954 में चीनी प्रधानमंत्री चाउ एन लाई भारत आए थे जबकि प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने चीन की यात्रा की थी। चीनी प्रधानमंत्री क्विंग और मनमोहन की 2013 की ये यात्राएं ऐतिहासिक मानी जा रही हैं, क्योंकि दोनों पक्षों ने दोनों देशों के बीच की वह दोस्ती और गरमजोशी ताजा करने की कोशिश की है जो 1962 के युद्ध में नष्ट हो गई।
      
बहरहाल, प्रधानमंत्री पद पर आसीन होने के बाद सबसे पहले भारत की यात्रा करने का क्विंग के फैसले की अहमियत उस समय खतरे में पड़ गई थी जब चीनी सैनिकों ने अप्रैल में लद्दाख की देपसांग घाटी में अपने तंबू गाड़ दिए।
     
बहरहाल, गहन वार्ता के माध्यम से यह उलझा हुआ मुद्दा सुलझा लिया गया। चीनी सैनिक लददाख की देपसांग घाटी से हट गए। क्विंग की सदभावना यात्रा खासी सफल रही। उनकी यात्रा का असर मनमोहन की चीन यात्रा के दौरान महसूस की गई जब चीनी नेताओं ने खुब गरमजोशी दिखाई।
     
मनमोहन की तीन दिन की यात्रा के दौरान दोनों पक्षों ने सीमा सुरक्षा सहयोग करार (बीडीसीए) पर दस्तखत किए जिसने विवादित सीमा की गश्त से उभरने वाले मुद्दों को हल करने के समग्र तंत्र की रूपरेखा पेश की। बीडीसीए के अतिरिक्त दोनों देशों की सेनाओं ने पांच साल के लंबे अंतराल के बाद पहली बार संयुक्त सैन्य अभ्यास किया।
     
मनमोहन की यात्रा में खास बात रही अनौपचारिकता। पूर्व प्रधानमंत्री वेन च्याबाव ने उनके सम्मान में भोज का आयोजन किया जबकि क्विंग ने उन्हें फारबिडेन सिटी का दौरा कराया। मार्च में सत्ता की बागडोर पाने के बाद चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने भारत के साथ संबंध सुधारने के लिए पांच सूत्री फार्मुला पेश किया था। उन्होंने एक दूसरे की अहम चिंताओं को दूर करने और सीमा पर शांति की कोशिश करते हुए विवादों के उचित हल पर जोर दिया।
     
शी की ओर से पेश पांच सूत्रों में बुनियादी ढांचा में द्विपक्षीय सहयोग, परस्पर निवेश, विकासशील देशों के हितों की रक्षा के लिए बहुपक्षीय मंचों पर सहयोग और वैश्विक चुनौतियों से निबटारा शामिल है।
     
शी ने कहा था कि सीमा समस्या इतिहास की ओर से छोड़ा गया एक जटिल मुद्दा है और इसे हल करना आसान नहीं होगा। बहरहाल, जब तक हम दोस्ताना सलाह-मश्विरा करते रहेंगे, हम अंतत: किसी उचित, युक्तिसंगत और परस्पर स्वीकार्य हल तक पहुंचा जा सकता है।
     
अपनी यात्रा के दौरान मनमोहन ने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के केन्द्रीय स्कूल को संबोधित करने का सम्मान मिला। यह मौका हर किसी को नहीं दिया जाता। मनमोहन ने अपने संबोधन में दोनों देशों के बीच सहयोग के सात व्यवहारिक उसूल पेश किए। इनमें भारत-चीन सीमा क्षेत्र पर शांति बनाए रखते हुए एक दूसरे की अहम चिंताओं के प्रति संवेदनशीलता शामिल है।

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  • Web Title:भारत-चीन संबंधों के लिए उतार-चढ़ाव का रहा साल