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विकलांगों का महकमा खुद अपाहिचा!

विकलांगों के कल्याण के लिए बने कानून को राज्य में सख्ती से लागू कराने हेतु अलग महकमा बनाया गया। लेकिन हकीकत में वह महकमा खुद विकलांग है। महकमा बनने की घोषणा के बाद विकलांगों को यह लगा था कि अब कानूनी अधिकारों के तहत सरकारी योजनाओं का लाभ उन्हें मिलेगा। लेकिन उन विकालांगों को तब निराशा हुई जब उन्हें यह बताया गया कि नि: शक्तता आयुक्त का न कहीं दफ्तर है और कहीं मिलने की जगह।ड्ढr ड्ढr दफ्तर नहीं है तो न कोई बाबू हैं और न ही चपरासी। सबकुछ कागजों पर ही चल रही योजनाओं को क्रियान्वित कराने की जवाब देही पहले से ही निर्धारित है। लेकिन अफसरों के नकारात्मक रवैए और गलत सोंच के कारण राज्य के विकलांगों को राहत नहीं मिल रही थी। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को जब इस बात का एहसास हुआ तो उन्होंने अलग से विकलांगों के कल्याण के लिए एक महकमा ही बना दिया। इतना ही नहीं कारगर तरीके से काम शुरू हो सके इसलिए नि:शक्तता आयुक्त के नवसृचित पद पर आई.ए.एस. अधिकारी को पदस्थापित भी कर दिया गया।ड्ढr ड्ढr विकलांगों के लिए बने कानून के तहत राज्य के विकलांगों को सही मायने में लाभ मिल रहा है या नहीं इसकी निगरानी का पूरा अधिकार आयुक्त को प्राप्त है। लेकिन मुख्यमंत्री की भावना के अनरूप सरकार के आला अधिकारियों ने इस नवसृजित महकमे को बुनियादी सुविधा तक उपलब्ध नहीं कराया। सूत्रों ने बताया कि जब नि: शक्तता आयुक्त स्वयं तीन महीने से वेतन के बगैर चल रहे हैं तो उनके महकमे के बार में सहज ही अंदाजा लागाया जा सकता है। कानून का लाभ विकलांगों को दिलाने वाला महकमा जब खुद विकलांग हो तो वह जरुरतमंदों तक न्याय कहां से पहुंचाएगा।

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