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बुद्धि है वरदान

महाभारत के उद्योग पर्व में प्रश्न पूछा गया है कि जब सर्वशक्ितमान ईश्वर किसी की रक्षा करना चाहता है या उसे नष्ट करना चाहता है, तो वह क्या करता है? उत्तर में कहा गया है कि ईश्वर जिनकी रक्षा करना चाहता है, उसे उत्तम बुयिुक्त कर देता है। पर जब वह किसी को नष्ट करना चाहता है तो इसके लिए विष या कोई तेज धार शस्त्र का उपयोग नहीं करता। केवल उस मनुष्य की बु िभ्रष्ट कर देता है ताकि वह स्वयं ही कुमार्ग पर अग्रसर होकर अपना सर्वस्व मिटा दे। जब बु िका हरण हो जाता है तो ऐसे व्यक्ित की दृष्टि नीच कर्मो की ओर झुक जाती है। बु िका पतन होने पर सत्य के मार्ग से भटक कर अज्ञान और अविद्या की ओर झुक जाता है। मनुष्य की बु िका अव्यवस्थित या दोषपूर्ण होना ही सभी दुखों का मूल कारण है। वैदिक विचारधारा यह कहती है कि बु िईश्वर का सर्वश्रेष्ठ वरदान है। बु िके द्वारा व्यक्ित अपना समाज और राष्ट्र का कल्याण कर सकता है। कल्याणकारी कर्मो द्वारा व्यक्ित लौकिक संपदा का स्वामी तो बनता ही है, वह ईश्वर के आनन्द का उत्तराधिकारी भी बन जाता है। मेधा बु िप्राप्त व्यक्ित कठिन स कठिन और सूक्ष्म से सूक्ष्म विषय सरलता से समझ पाता है। यजुर्वेद का एक मंत्र है।ड्ढr यां मेधा देवगण: पितरश्चोपासतेड्ढr तया मामद्य मेधायाग्ने मेधाविनं कुरुड्ढr अर्थात् हे ईश्वर! हम मेधा बु िको इसी जन्म में प्राप्त करें। ईश्वर हमारी बुयिों को दुगरुणों और व्यसनों से हटा कर सन्मार्ग की ओर प्रेरित करें। तीव्र इच्छा शक्ित और निरंतर स्वाध्याय और प्रयास से बु िका विकास और शु िसंभव होती है। मनुष्य और पशु के बीच की लक्ष्मण रेखा बु िहै। मनुष्य को बुतित्व ही पशुत्व से निकालकर मनुष्यत्व प्रदान करता है। ज्ञान की प्राप्ति के लिए बु िऔर आनन्द की प्राप्ति के लिए ज्ञान का होना जरूरी है। परोपकार और शुभकर्म की भावना केवल सद्बु िसे ही आती है और यही इसका लक्षण है।ं

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