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वोट और उदारवाद ने बदल दिया पंजाब को

पंजाब की घटनाओं पर पंजाब के बाहर का हिन्दुस्तान कुछ ज्यादा ही संवेदनशील है। पंजाब में पत्ता भी खड़के तो लोगों को अस्सी के दशक के आतंकवाद का भूत नजर आने लगता है। ताजा डेरा विवाद के बाद भी कुछ ऐसी ही प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। पर सच यह है कि आज की तारीख में पंजाब को आतंकवाद की तरफ धकेलना लगभग नामुमकिन हो गया है। ऐसे इक्के-दुक्के सिरफिरे आज भी हैं जो बंदूक के दम पर अपनी बात मनवाना चाहते हैं, उनको काबू में करने के लिए आज हमार पास एक पुख्ता समाजोन्मुखी राज्य व्यवस्था है। पंचायती राज चुनावों के हो जाने से लोग स्थानीय स्तर पर राजनीति में भागीदारी ले सकते हैं। और पिछले दस साल में उदारवादी व्यवस्था के रहते जो लोग अमीरी के सपने देखने लगे हैं वे अब ऐसे गैर जिम्मेवार राजनेताओं के फेर में नहीं आने वाले जो लोगों से शहादत मांगें। यह शहादत की घड़ी नहीं है, पैसे बनाने की है। विचारधारा के आधार पर खाड़कू बन कर पैसे नहीं कमाए जा सकते, केवल शहादत ही मिलती है। वैसे भी गुरु नानक देव विश्वविद्यालय के प्रोफेसर परमजीत जज, सेखों और पुरी के एक शोध ने यह साफ कर दिया है कि 10 के दशक में भी जो खाड़कू बने थे वे आर्थिक कारणों से ही बने थे ना कि किन्हीं वैचारिक कारणों से। आज इज्जत और अस्मिता की लड़ाई बंदूक के दम पर नहीं बल्कि वोटों के दम पर लड़ी जाती है। बड़े लोगों का धर्म अगर बाकी लोगों को बराबरी का दर्जा नहीं दे पाता तो लोग अपने ही छोटे-छोटे धार्मिक डेरा बना लेते हैं जसा कि पंजाब में फैले हुए कोई 000 डेरों को देख कर समझ में आता है। पर डर तो तब भी बना रहता ही है। राजनीतिकों की खुराफात के प्रति हम जितना सजग रह सकें उतना ही अच्छा। जब 24 जून 2008 को डेरा सच्चा सौदा के खिलाफ पंजाब में बंद हुआ तो सार देश के कान खड़े हो गए। राजनीतिक और आर्थिक विरोध प्रदर्शन करने के लिए तो कभी भी पंजाब में इतना व्यापक बंद नहीं हुआ था। किसानों की समस्याओं को लेकर केवल कुछ इलाकों में ही विरोध प्रदर्शन हुए हैं। उद्योगों की समस्याओं और सरकार में फैले भ्रष्टाचार पर तो कभी भी नहीं। पर धर्म को बचाने के नाम पर पंजाब और बाकी देश के बीच कुछ समय के लिए आवाजाही ठप्प हो गई। इस तरह के बंद पहले आतंकवाद के समय में देखे गए थे। उस वक्त खाड़कुओं के कहने पर पंजाब में रह-रह कर काम बंद हो जाता था। वे भी धर्म के नाम पर ही अपना रुवाब जमाते थे। बड़ा फर्क यह था कि खाड़कुओं का सरकार विरोध करती थी जबकि इस बार सरकार एक कोने में खड़ी होकर तमाशा देखती रही। मानों साधारण जीवन को रोक देने का वह छुप-छुप के समर्थन कर रही हो। उस वक्त भी खाड़कुओं को ताकत बढ़ाने का मौका तब मिला था जब सरकार ने आगे बढ़ धर्म के कामों में हस्तक्षेप किया और धर्म के नाम पर लोगों को सक्रिय (मोबिलाक्ष) किया ताकि कुछ नेताओं का राजनीतिक उल्लू सीधा हो सके। कहीं ऐसा तो नहीं है वह काला समय फिर लौट रहा हो? सरकार हाथ पर हाथ धर बैठी रही हालांकि विरोध प्रदर्शन करने वाले गुटों ने लम्बी चेतावनी दे रखी थी कि यदि बाबा गुरमीत राम रहीम को पुलिस पकड़ नहीं लेती तो वे पंजाब बंद कर देंगे। डेढ़ साल से, जब से वर्तमान अकाली-भाजपा गठाोड़ ने पंजाब में सरकार बनाई है वो डेरा सच्चा सौदा को सबक सिखाने के मौके ढूंढते रहे हैं। आखिरकार 2007 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने डेरा सच्चा सौदा के समर्थन से ही थोड़ी-बहुत जीतड्ढr हासिल की थी। वरना कांग्रेस का तो पंजाब में सफाया ही हो जाना था।ड्ढr अकाली डेरा को सब सिखाने की फिराक में थे और डेरा सच्चा सौदा के बाबा गुरमीत राम रहीम ने जब मई 2007 में सिखों को कुरदा उन्हें मौका मिल गया। सरकार ने इन विरोधों को बंद करने की कोई कोशिश नहीं की। सिख रूढ़िवादियों ने यह जरूर किया कि जहां भी हो सके डेरा के लोगों पर सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक हमले किए। कहीं-कहीं तो मारपीट भी हो गई। और सरकार मुंह बाए खड़ी रही। कुछ सिरफिरों ने बाबा गुरमीत राम रहीम को जान से मारने की धमकी भी दे डाली। पंजाब के माहौल में इस तरह की धमकियों को सीरियसली लिया जाता है। इस बात की आड़ लेकर डेरा सच्चा सौदा ने अपने ही हथियारबंद दस्ते खड़े कर लिए। इन्हीं में से एक ने पिछले दिनों मुम्बई में एक सिख की हत्या भी कर दी-इस बिना पर कि उन्हें खतरा था कि यह अधेड़ उम्र का, निहत्था, कारोबारी सिख बाबा गुरमीत राम रहीम की जान के लिए खतरा था। बाबा के साथ चल रहे हथियारों से लैस पुलिस वालों को इस तरह का कोई खतरा नहीं लगा यह अलग बात है। बहरहाल, इसके विरोध में जो भरपूर मोबिलाक्षेशन पंजाब में हुआ उससे लोगों को 13 अप्रैल 1ी घटनाएं याद आ गईं जब अकाली कीर्तनी जत्थे पर निरंकारी समाज के लोगों ने हमला किया था और 13 सिख मार गए थे। इस घटना के बाद पंजाब में दमदमी टकसाल के संत जरनैल सिंह भिंडरांवाले पंथ के प्रमुख सेवक के रूप में सामने आए। उन्हें पहले अनेक राजनीतिक दलों का समर्थन प्राप्त हुआ। उनके आसपास खाड़कुओं के अनेक गुट खड़े हो गए। पाकिस्तान की मदद से अगले पंद्रह साल इन्होंने पंजाब को बड़े कष्ट में डाला। अच्छे भले राज्य का मटियामेट हो गया। बड़ी मुश्किल से, और काफी खून बह जाने के बाद पंजाब को इन लोगों से छुट्टी मिली। अब नए सिर से राजनीतिक दल लोगों की धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ करने लगे हैं। सो लोगों का यह डर स्वाभाविक ही है कि वही इतिहास फिर से न दोहराया जाए। पर यही डर पंजाब में आतंकवाद को पनपने नहीं देगा। लोग अतिवादी नेताओं की बातों पर सड़क पर नहीं आएंगे। यह तो इसी बात से साफ हो गया, जब उन्होंने अतिवादी सरदार सिमरनजीत सिंह मान के अकाली दल को लगभग न के बराबर वोट दिए। भले हमार राजनेता कितने भी ऊलजलूल विषयों को लेकर लोगों को उकसाने की कोशिश करं, लोग इस बार बहकावे में नहीं आने वाले। लेखक पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़ में इतिहास के प्रोफेसर हैं।

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