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समाज : मासूमों के साथी बन गए हथियार

उसमें इस स्थिति की विशेष चर्चा की गई थी। नौ से 17 साल की उम्र के 1700 बच्चों पर किए गए अध्ययन में इस बात का भी विशेष उल्लेख था कि किस तरह वहां बच्चों में अपराध की संस्कृति बढ़ रही है। बच्चों ने बताया कि पिछले 12 महीनों में आठ में एक बच्चा स्कूल में छुरा या बन्दूक लेकर गया था। यह अकारण नहीं कि अब तक 31 बच्चे ऐसी आपसी मारपीट में मर चुके हैं।ड्ढr ब्रिटेन के बच्चों की स्थिति पर यह रिपोर्ट भारत के बच्चों पर आई ताजा रिपोर्ट स काफी मेल खाती है। पिछले साल-दो-साल से बच्चे तथा किशोरों द्वारा हिंसक घटनाओं को अंजाम देने तथा हिंसक व्यवहारों पर मुल्क के अन्दर लगातार चर्चा हो रही है। बच्चों की इन प्रवृत्तियों पर समाजशास्त्री, मनोवैज्ञानिक, लेखक सबने अपनी मान्यता और ज्ञान के अनुरूप राय व्यक्त की है। राजधानी के एक स्कूल में पिछले साल रिवाल्वर से अपने सहपाठी की हत्या जैसी बड़ी घटना ने इस समस्या की गम्भीरता को सामने ला दिया था। इसके बाद मध्यप्रदेश के एक स्कूल तथा अन्य कुछ जगहों से भी ऐसी ख़बरें मिली थीं। वहां एक आदिवासी लड़के के साथ सवर्ण समाज के किसी बच्च का झगड़ा हुआ और दूसरे दिन उस लड़के ने आदिवासी लड़के को चाकू से मार दिया। ऐसी अतिहिंसक घटनाओं के अलावा आपसी मारपीट तथा छोटे-मोटे झगड़ों में भी आक्रामक, हिंसक प्रवृत्तियों को उाागर किया है। इस बारे में सफदरजंग अस्पताल के कम्युनिटी मेडिसिन विभाग ने दक्षिणी दिल्ली के तीन स्कूलों में और दा कॉलजों में एक अध्ययन कराया। अध्ययन में 14 से 1वर्ष के बीच के 550 बच्चों को शामिल किया गया। नतीजे चौंकाने वाले हैं और सोचन के लिए मजबूर करते हैं। अध्ययन के मुताबिक 12 फीसदी बच्चे हथियार रखकर पढ़ने जाते हैं। रिपोर्ट के अनुसार 15़7 प्रतिशत बच्चे और 3़लड़कियां हथियार लेकर पढ़ने जातीं हैं। पिछले एक साल में 13़5 छात्रों ने अपने इन हथियारों से किसी न किसी को घायल किया या डराया-धमकाया। छात्रों के पास के हथियारों में चाकू, पिस्तौल, हंटर, कृपाण आदि शामिल थे। कहने के लिए यह भले ही हो कि ये बच्चे आत्मरक्षा के लिए हथियार रखते हैं, लकिन हकीकत यही होती है कि वे इससे सहपाठियों के बीच अपना दबदबा व आतंक कायम करते हैं। ऐसा नहीं है कि वे रोज इन हथियारों से किसी को चोट पहुंचाते हैं या किसी की हत्या करते हैं किन्तु दूसरों को कमजोर स्थिति में डालन के लिए यह काफी होता है। यह भी सोचन की जरूरत है कि घरवाले या स्कूल प्रशासन हथियार रखन की इजाजत क्यों देते हैं। सम्भव है कुछ छात्र ऐसा छिपा कर करते होंगे पर अधिकतर के घरवालों के लिए भी यह स्वीकार्य होगा। वे भी तो यह सिखाते हैं कि बेटा, पिट कर नहीं आना। पीट देना। दूसरों पर भारी पड़ने की सीख ही मिलती है, इन बच्चों को। ऐसा वे विरला ही सुनते होंगे कि कभी किसी को नुकसान नहीं पहुंचाना, या दूसरों के अधिकारों का सम्मान करना चाहिए। कुल मिलाकर घर से जो सीख मिलती है, उसमें जनतांत्रिक चेतना विकसित करन के तत्व नहीं होते हैं। और हर कीमत पर खुद आगे रहन के तत्व भरपूर होते हैं। हमारे बच्चों के समाजीकरण के पाठ में यही बात बड़ी होती है। रही-सही कसर मीडिया और समाज के शेष अंग पूरा कर देते हैं। आज के बच्चों को अवसर तुलनात्मक रूप में पहले से अधिक मिल रहा है। इसलिए सकारात्मक पक्ष यह है कि वे अधिक सक्षम और तेज भी हैं। उन्हें कम समय में ज्यादा ज्ञान हासिल होता है। इसलिए पर्याप्त सम्भावना भी है कि वे ज्यादा सक्षम और अधिक संवेदनशील नागरिक बन सकें। यह तभी हो सकता है, यदि घर और बाहर का परिवेश बदलन की जरूरत समझी जाए। ब्रिटेन के बच्चों की स्थिति पर रिपोर्ट साफ कहती है कि ‘मंत्रीगण, जिसमें प्रधानमंत्री भी शामिल हैं, बच्चों के बारे में बात करते हुए हमेशा अधिकारों और सामाजिक न्याय की बात करते हैं, हकीकत में यह बात स्वीकारने में कि बच्चों के अधिकार होते हैं, वह हिचकिचाते हैं ़.़ और बच्चों के अधिकारों के हनन की दुर्घटनाएं हमारी अपनी संस्थाओं और समाज में हो रही हैं।’ यह बात भारत के बच्चों के हालात पर भी फिट बैठती है। लेखिका स्त्री अधिकार संगठन से सम्ब हैं

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