DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

अधिकार माता की बजाय,पालने वाले का

मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने एक जन्म देने वाली माता की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका खारिज कर दी जिससे उसकी पांच वर्षीय पुत्री उसे पालने वाली दंपती के पास ही रहेगी। यह फैसला न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा और न्यायमूर्ति आर के गुप्ता की खंडपीठ ने सुनाया।ड्ढr ड्ढr न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा और न्यायमूर्ति आर के गुप्ता की खंडपीठ ने गुरूवार को फैसला सुनाते हुए जन्म देने वाली माता तबस्सुम बानो की वह याचिका खारिज कर दी। जिसमें उसने अपनी पुत्री वंशिका को सौंपने की मांग की थी। न्यायालय नें कहा कि वंशिका के कल्याण को देखते हुए उसे पांच वषर्ो से पाल रहे पिल्लै दंपती के पास रहने देना उचित है। न्यायालय ने इसके साथ ही यह भी कहा कि याचिकाकर्ता अपनी पुत्री को संरक्षण में लेने के लिए गार्जियन एंड वार्ड एक्ट के तहत सिविल न्यायालय में तथ्यों और सबूतों के साथ याचिका दायर कर सकती है। बंदी प्रत्यक्षीकरण के माध्यम से वह अपनी पुत्री का संरक्षण प्राप्त नहीं कर सकती है। न्यायालय ने मंगलवार को इस याचिका पर सुनवाई पूरी करने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था। पिल्लै दंपती के अधिवक्ता जयंत नीखरा ने न्यायालय को बताया था कि जबलपुर के पिल्लै दंपती आशा और रवि वर्ष 2004 में उत्तरप्रदेश के जालौन जिले के उरई की डॉ संध्या गुप्ता के अस्पताल से प्री मैच्योर 15 दिन की बच्ची वंशिका को लेकर आए था। उस समय उसकी वास्तविक माता के सामने नहीं आने के कारण गोद लेने की कानूनी प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी थी।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title: अधिकार माता की बजाय,पालने वाले का