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मैं रांची पहाड़ी हूं और बोझ मत डालो

मैं रांची पहाड़ी हूं। सैकड़ों साल से मैं अनवरत आपकी सेवा कर रही हूं। सलानी मुझे रांची की आन-बान और शान आदि की उपमा देकर जाते हैं, पर आज मैं दुखित होकर अपनी बेवशी आपके पास रख रही हूं। दिनो- दिन मुझपर बोझ बढ़ रहा है। मैं थक गयी हूं, अब सहन नहीं होता। प्लीज, ज्यादा बोझ मत दो वर्ना मैं टूट जाऊंगी।ड्ढr मुझे सुंदर बनाने के नाम पर बेतहाशा बोझ बढ़ाया जा रहा है। जिसकी मर्जी वही श्रंगार के नाम पर मेरा अंग भंग कर रहा है। नतीजन, मेर शरीर के कई हिस्से खोखले हो गये हैं। एक भाग भी गिरा, तो भारी तबाही हो सकती है। शासनतंत्र के लोग खामोश हैं। झारखंड के प्रसिद्ध धार्मिक और ऐतिहासिक धरोहर के रूप में मेरी पहचान है। 170 से मेर मुकुट पर नाग की पूजा हो रही है। आजादी से पूर्व अंग्रेजी हुकूमत ने पालकोट राजा से मुझे हासिल किया। 10 में रांची के तत्कालीन उपायुक्त डालटन ने 26 एकड़ 13 कड़ी में फैले मेर अस्तित्व का अधिग्रहण किया। मेरी ऊंचाई 383 फीट है। मैं एंथ्रेसाइट और बॉक्साइट का टीला हूं। मेरी चौड़ाई 4,124 स्क्वायर फीट है। मेरा चौतरफा शोषण हो रहा है। निचले हिस्से का गरीबों ने अतिक्रमण कर लिया है, तो ऊपर व्यवसायिक उपयोग हो रहा है। हाल में पुलिस वालों ने भी मेर माथे पर एक टावर खड़ा कर दिया।ड्ढr तकनीकी विशेषज्ञ की राय के बगैर खड़ा किया गया 88 टन का यह टावर मेरे लिए सिरदर्द बन गया है। पहले से ही 800 टन का अतिरिक्त बोझ ढो रही हूं। रहम करो मुझपर अब सहन नहीं होता। अन्यथा मैं कभी भी धराशायी हो सकती हूं। इससे बड़ा खतरा हो सकता है। झारखंड के नुमाइंदो, नागरिकों और पर्यावरणप्रेमियों सुनों मेरी रक्षा करो ताकि मैं बिना किसी डर के आपकी सेवा में जुटी रह सकूं।ड्ढr

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