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न दैनं न पलायनं

‘न दैनं’- दीन-हीन बनकर भी जीना कोई जीना नहीं। ‘न पालायनं’- किसी भी संकट में भागना नहीं। हर व्यक्ित के जीवन में ऐसे क्षण आते हैं, जब उसे आगे बढ़ने की राह नहीं सूझती। इतना ही नहीं संकट या कोई न कोई व्यक्ित उसके आगे पहाड़ बनकर खड़ा होता है। मानों उससे भिड़ना या उसे पार करना असंभव। उसके आगे दीन-हीन बनकर ही गिड़गिड़ाया जा सकता है। आगे बढ़ने की राह निकाली जा सकती है। दूसरी स्थिति होती है, पलायन की। आगे बढ़ने के हठ को छोड़ने की। मैदान छोड़ कर भागन की।ड्ढr लेकिन पुरुषार्थ कहता है- ‘न दैनं न पलायनं’। महाभारत की यह पंक्ित साधारण से साधारण मनुष्य को भी प्रेरणा देती है। हर पल संकटों, बाधाओं और चुनौतियों से समझौता कर लेन का ही मन करता है। हार मान लेन की इच्छा होती है। पर ऐसे व्यक्ित पुरुषार्थी नहीं कहलाते। कहा गया है- ‘पुरुषार्थी वह है जो अपनी भाग्य रेखा को बदल दे।’ भाग्य रेखा को बदलन की शक्ित रखने वाला व्यक्ित दीन-हीन नहीं हो सकता। दीनता व्यक्ित के अंदर की ऊर्जा का क्षय करती है। दीनता और पलायनता में अटूट संबंध है। यह भी कहा जा सकता है कि पलायन की प्रथम सीढ़ी दीनता है। और दीनता का आधार आत्मनिंदा है। जो व्यक्ित अपन को शरीर, मन और बुद्धि स कमजोर समझता है, वह आत्मनिंदा करने लगता है। आत्मनिंदा से वह दीन-हीन हो जाता है। और दीन व्यक्ित ही परिस्थिति से पलायन कर जाता है। कभी-कभी तो जीवन से ही। आत्महंता भी ऐसे ही व्यक्ित होते हैं।जीवन जीन के लिए है। पलायन के लिए नहीं। और बिना संघर्ष के जिन्दगी में आनंद भी तो नहीं आता। स्वाभिमानी जीवन जीन के लिए अधिक धन की भी आवश्यकता नहीं होती। दरअसल, धन तो उतना ही चाहिए जो दीन न बनाए या पलायन न करवाए। कभी-कभी धन कमान की अतिशय लालसा भी दीन बना देती है।

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