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महंगाई दबाने और विकास बचाने की जुगत

फिलहाल हमारी चिंताएं तीन चीजों को लेकर हैं- परमाणु करार, महंगाई की मार और विकास दर को कैसे रखा जाए बरकरार। परमाणु करार पर तो सरकार ने आगे बढ़ने का फैसला कर ही लिया है। इसके राजनैतिक नतीजों से निपटने की तैयारी भी कर ली है। लेकिन महंगाई का मसला थोड़ा अलग किस्म का है। मुद्रास्फीति पर लगाम लगाने जितनी ही प्राथमिकता है विकास दर को बरकरार रखने की। इसी संबंध में एक महीने पहले भारत की आर्थिक नीतियों में सुधार विषय पर स्टैनफोर्ड सेंटर फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट की नवीं सालाना कांफ्रेंस हुई थी। पिछले बरसों की तरह यहां एकेडमिक विशेषज्ञ, नीति नियामक और कार्पोरट क्षेत्र के अगुवा मौजूद थे। सम्मेलन में हमारी मौजूदा आर्थिक रणनीति के महत्वपूर्ण मुद्दों पर बातचीत हुई। जिसमें वित्त नीति, विकास, श्रम सुधार, बैंकिंग, वित्तीय क्षेत्र, जसे मसलों के अलावा उन बाधाओं पर भी चर्चा हुई, जो भारत के कदम रोक रहे हैं। फिलहाल मै इनमें से सिर्फ उस एक सत्र पर बात करूंगा जिसमें माइकल बोस्किन ने मौजूदा परशानियों पर अपने नुस्खे बताए। साथ ही इनसे मिलने वाले वे सबक भी, जिनका हमें ध्यान रखना होगा। हमने विकास पर स्पेंस आयोग के सुझावों का ज्यादा ध्यान नहीं रखा है जिसमें हमें लगभग सर्वस्वीकार्य करने और न करने लायक चीजें बताई गई थीं। इसमें बाजार की कट्टर नीतियों और संस्थागत कट्टरता में एक संतुलन बनाने की बात कही गई थी। इस लिहाज से बोस्किन के सुझाव हमारे लिए काफी तात्कालिक महत्व रखते हैं। उनके कुल आठ सुझाव हैं- मूल्यों को जहां तक मुमकिन हो उनकी उपलब्धता के अनुसार बनाए रखना, यह ध्यान रखना कि सबसिडी सबसे कम आयवर्ग वालों को मिले खास वर्ग के लोगों को नहीं, अर्थव्यवस्था में सरकार की भूमिका कम से कम हो, करों की दरं कम हों, लेकिन उनका आधार व्यापक हो, सार्वजनिक र्का और जीडीपी का अनुपात नियंत्रण में रहे, हर खर्च और फैसले को उसकी सामाजिक लागत और सामाजिक लाभ की कसौटी पर परखा जाए, सरकार के विभिन्न स्तरों पर जिम्मेदारियों और संसाधनों का संतुलन बनाया जाए, और तेज आर्थिक विकास के समय गैरबराबरी पर ध्यान न दिया जाए। ऐसा हर कदम हमारी रणनीति पर असर डाल सकता है। इनमें सबसे अहम है ऊरा का कुशलता से मूल्य निर्धारण- इसकी सबसिडी सबके लिए नहीं, सिर्फ सबसे कम आमदनी वालों के लिए ही हो। और किसी नए सबसिडी कार्यक्रम को अपनाने से पहले उसकी कड़ी परीक्षा हो। बोस्किन का कहना है कि अलग-अलग तरह के कर या अलग-अलग तरह की सबसिडी से कई तरह की गड़बड़ियां पैदा हो जाती हैं। उन्हें बनाए रखने के स्वार्थ वाली ताकतें काफी असरदार होती हैं इसलिए उन्हें खत्म करना काफी मुश्किल हो जाता है। मसलन पेट्रोल की कीमतों से भारत में पेट्रोलियम कंपनियों को जो चपत लग रही है वह भारत के जीडीपी का चार फीसदी है। इसका विरोध करने वालों का तर्क है कि अगर इसकी सबसिडी को धीर-धीर कम करते हुए खत्म कर दिया जाए तो इसके आर्थिक और सामाजिक नुकसान को कम दर्दनाक बनाया जा सकता है। सबसिडी का लाभ उन लोगों को भी देना जिन्हें इसकी कोई जरूरत नहीं है, यह सबसिडी का दुरुपयोग है। व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि सबसिडी सीधे उन लोगों तक पंहुचे जिन्हें इसकी जरूरत है। लेकिन हम जानते हैं कि ऐसे वर्ग की पहचान करना और उनके लिए पैमाना बनाना काफी मुश्किल काम है। सबसिडी के मसले पर यह ध्यान तो रखा ही जा सकता है कि ऐसा कोई कार्यक्रम न बनाया जाए जिसमें बड़ी तादाद में सबसिडी का ट्रांसफर होता हो। नीति नियामकों के लिए चुनौती यह है कि हमारी सार्वजनिक वितरण प्रणाली कार्यकुशल नहीं है इसलिए बड़े-बड़े वादे करके लोगों की उम्मीदों को हद से ज्यादा नहीं बढ़ाया जाए। सरकार के लिए सुझाव यह है कि वह अपना ध्यान मुख्य रूप से सार्वजनिक इंफ्रास्ट्रक्चर, शिक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर दे। ऐसी योजनाएं न चलाई जाएं जो हर लगातार चलें और कभी खत्म न हों। ऐसी योजनाओं का सरकारी खर्च पर दबाव हमेशा बढ़ता ही रहेगा। भारत में केंद्र और राज्यों के बीच राजस्व साझा करने की जो व्यवस्था है वह अपने आप में पर्याप्त है। लेकिन हमें राज्यों को सार्वजनिक खर्च वाले स्थानीय स्तर के कार्यक्रमों की प्रयोगशाला नहीं बनाना चाहिए। और आखिरी मुद्दा है तेज विकास के दौर में अगर गैरबराबरी बढ़ती है तो इसे बर्दाश्त करना - यह एक विवादास्पद मसला है और अपने देश में इससे सहमत होने वाले लोग बहुत कम होंगे। राजनैतिक दल विकास और बराबरी का नारा देते हैं और आजकल तो सबके विकास का नारा और रणनीति ही फैशन में हैं। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मुख्य धारा में लाना, गरीबी हटाओ की विशेष योजनाएं बनाना, अति गरीब लोगों के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य की योजनाएं हमार देश के लिए नई नहीं है। टी एन श्रीनिवासन जसे अर्थशास्त्रियों का कहना है कि नार भले ही बदल जाते हों, लेकिन इस तरह की योजनाएं पहली पंचवर्षीय योजना से ही हमार साथ हैं। हाल ही में हमार यहां जो तेज आर्थिक विकास हुआ है उसे लेकर दुनियाभर में सजगता भी है और उसकी तारीफ भी हुई है। साथ ही हमारी वित्तीय स्थिरता, बड़ी देनदारियों और कुशलता से बेपरवाह बढ़ते सार्वजनिक खर्च को लेकर चिंता भी है। ऊरा और खाद्यान्न संकट ने नीतिगत विकल्पों को काफी जटिल बना दिया है। विकास और मुद्रास्फीति का संतुलन बनाए रखना कभी आसान नहीं रहा। और आज जिस तरह के कष्ट का समय है, उसमें यह और भी मुश्किल हो जाता है। लेखक राज्यसभा सदस्य और पूर्व राजस्व सचिव हैं। वे योजना आयोग के सदस्य भी रह चुके हैं।

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  • Web Title: महंगाई दबाने और विकास बचाने की जुगत