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सांता और क्रिसमस की कहानी

सांता और क्रिसमस की कहानी

चलो जानते हैं कौन है ये दाढ़ी वाला सांता क्लॉज..। क्रिस क्रिंगल फादर क्रिसमस और संत निकोलस के नाम से जाना जाने वाला सांता क्लॉज एक रहस्यमय और जादूगर इंसान है, जिसके पास अच्छे और सच्चे बच्चों के लिए ढेर सारे गिफ्ट्स हैं। इंग्लैंड में ये फादर क्रिसमस के नाम से जाने जाते हैं। इंग्लैंड के सांता क्लॉज की सफेद दाढ़ी थोड़ी और लंबी और कोट भी ज्यादा लंबा होता है।

गिफ्ट्स को एक बड़ी सी झोली में भरकर वो क्रिसमस के पहले की रात यानी 24 दिसंबर को अपने स्लेज पर बैठता है। उसके बाद पलक झपकते ही उसके स्लेज में 8 उड़ने वाले रेनडियर उसे बच्चों के बीच पहुंचा देते हैं, जिन्हें वो अपने सुंदर-सुंदर उपहार देकर दुनिया में खुशियां फैलाता है।

कहानी क्रिसमस ट्री की...
क्रिसमस का मौका हो और क्रिसमस ट्री की बात न हो, ऐसा हो सकता है भला..?
क्रिसमस पर इस ट्री का चलन जर्मनी से आरंभ हुआ। कहा जाता है कि मार्टिन लूथर ने क्रिसमस के अवसर पर अपने बच्चों के लिए बगीचे से फर का पेड़ लाकर अपने घर की नर्सरी में लगाया। इस पेड़ को उन्होंने कैंडल्स से सजाया ताकि वे जीसस के जन्मदिन पर बर्फीली रात की खूबसूरती को अपने बच्चों को दिखा सकें। पर क्रिसमस से इस पेड़ का जुड़ाव सदियों पुराना बताया जाता है। यूरोप में कहते हैं कि जिस रात जीसस का जन्म हुआ, जंगल के सारे पेड़ जगमगाने लगे थे और फलों से लद गए थे। यही वजह है कि क्रिसमस के दिन इस पेड़ को घर लाकर सजाते हैं।

इस पेड़ को घंटियों यानी बेल्स आदि से सजाते हैं, ताकि बुरी आत्माएं दूर रहें। वहीं घर में अच्छाइयों के प्रवेश के लिए एंजेल्स और फेयरी की मूर्तियां लगाई जाती थीं।

यूक्रेन में तो मकड़े यानी स्पाइडर व उसके बुने हुए जालों से क्रिसमस ट्री को सजाते हैं। वहां ऐसा माना जाता है कि एक गरीब परिवार के यहां क्रिसमस ट्री पर जाले लगे हुए थे। क्रिसमस की सुबह सूर्य की रोशनी पड़ते ही वे चांदी में बदल गए थे। ऐसी कई कहानियां हैं, जो ट्री को सजाने से लेकर जोड़ी गई हैं।

क्यों मनाते हैं क्रिसमस
बारह दिनों तक मनाए जाने वाले इस त्योहार का नाम क्रिसमस क्राइस्ट्स माइसे अथवा क्राइस्ट्स मास शब्द से हुआ है। ऐसा अनुमान है कि पहला क्रिसमस रोम में 336 ई. में मनाया गया था। यह प्रभु के पुत्र जीसस क्राइस्ट के जन्म दिन को याद करने के लिए पूरे विश्व में 25 दिसंबर को मनाया जाता है। क्रिसमस पर लोग चर्च जाकर प्रार्थना करते हैं और प्रभु की प्रशंसा में कैरल गाते हैं। वे प्यार व भाईचारे का संदेश देते हुए घर-घर जाते हैं।

कैरल्स क्यों गाते हैं...
कैरल्स यानी क्रिसमस के गीत। क्रिसमस आते ही हवाओं में हल्की संगीत की धुन गूंजने लगती है। कैरल्स शब्द की उत्पत्ति फ्रेंच भाषा के शब्द केरोलर से भी मानी जाती है, जिसका अर्थ है घूमते हुए नाचना। क्रिसमस गीतों में सबसे पुराने गीत का जन्म चौथी सदी में हुआ। हल्की-फुल्की और गाने में आसान धुनें 14वीं शताब्दी में चलन में आईं। फिर इन्हें इटली में सुना गया। क्रिसमस कैरल्स का सर्वाधिक लेखन और विकास तथा उन्हें प्रसिद्धि 19वीं शताब्दी में मिली है। कैरल्स को नोएल भी कहा जाता है। इन गीतों में पड़ोसियों के लिए शुभकामनाएं दी जाती हैं। इसमें क्रिसमस पर अपने पड़ोसियों के घर जाना और उनके साथ बैठकर क्रिसमस कैरल का आनंद लेना होता है।

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