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तेल के दामों में लगी आग.. क्यों?

गुरुवार को यूएस क्रूड-ऑयल की कीमतें नया रिकॉर्ड बनाते हुए 145 डॉलर प्रति बैरल को पार कर गईं। 2007 की शुरूआत में 50 डॉलर प्रति बैरल से शुरू तेल का सफर साल के अंत तक आते-आते डॉलर पर आ गया। इस साल के शुरूआती 6 महीनों में ही तेल की कीमतों में पिछले साल के उच्चतम मूल्य से करीब 50 फीसदी का इजाफा हुआ। ऊंचाई का यह ग्राफ यहीं नहीं रुकता! तेल की कीमतों के 175 डॉलर तक पहुंचने की संभावना जताई जा रही है। प्रमुख कारणड्ढr डॉलर की कमजोरी: कीमतों में बढ़ोत्तरी के लिए अन्य करंसी के मुकाबले डॉलर की कम कीमतों को भी एक प्रमुख कारण माना जा रहा है, इससे डॉलर पर आश्रित कमोडिटीा अपेक्षाकृत सस्ती हुईं। ओपेक: पेट्रोल निर्यातक देशों का संगठन (ओपेक) भी तेल मूल्यों को लेकर चिंतित रहा। इस मुद्दे पर हुई संगठन की आपात बैठक में भी डॉलर की कमजोरी को महंगाई की वजह माना गया। राजनीतिक खींचतान: संयुक्त राज्य के न्यूक्िलयर-प्रोग्राम को लेकर ओपेक का दूसरा सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश राजनीतिक विवाद में फंस कर रह गया। अन्य मुद्राओं को तेल खरीदने के लिए अनुमति देने के ईरान के प्रस्ताव को किसी अन्य देश का समर्थन नहीं मिला। डिमांड: भारत और चीन सहित विकासशील देशों में बढ़ती तेल की मांग को कीमतों में वृद्धि की वजह बताया गया। कुछ विकसित देशों ने तेल पर लगने वाले टैक्स पर कमी कर जनता को राहत देने का प्रयास किया लेकिन बढ़ते सब्सिडी बोझ से मजबूरन कीमतों में वृद्धि करनी पड़ी। तेल शोधन की क्षमता: हालांकि तेल उत्पादन बढ़ाकर डिमांड-सप्लाई के बीच की दरार को पाटने का प्रयास किया जारहा है लेकिन रिफाइनरियों की क्षमता पर भी गौर करना जरूरी है। कैसे मिले तेल: विशेषज्ञ हमेशा पूछते रहे हैं कि क्या ओपेक तेल उत्पादन बढ़ाने में सक्षम है?ड्ढr सत्यता यह है कि इराक में तेल उत्पादन अमेरिकी हमले के बाद से बाधित पड़ा है। ओपेक का सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश अपने तेल दोहन में बाहरी कंपनियों की दखल अंदाजी नहीं चाहता।

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