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चढ़ते-उतरते सूचकांक

विश्वास और गठबंधन सिर्फ राजनीति के गलियारों में ही नहीं टूट रहे। अर्थनीति में भी विश्वसनीयता का अकाल है। सेंसेक्स को देख लीजिए। प्रॉपर्टी, सर्राफा और शेयरों की चाल में रिश्ते खोजने वाले जब थक कर बैठ गए तो भाई लोगों ने मुद्रास्फीति, तेल और सेंसेक्स में पैटर्न ढूंढ़ने शुरू कर दिए थे। वे भी अब सिर धुन रहे हैं। शुक्रवार को तेल और महंगाई दोनों के रिकॉर्ड टूटने की खबर आई। अंदेशा था कि सेंसेक्स भी नई तलहटी में पहुंचेगा। मगर वह 360 अंक उछल गया। अब सबको सांप सूंघा हुआ है। सारी व्याख्याएं चुक गईं। सेंसेक्स बार-बार साबित करता है कि बाजार बड़े मुनाफाखोरों की सनक से गिरता-उठता है लेकिन एक्सपर्ट हैं कि कारण-कर्म के पावन सिद्धांत खोजने पर आमादा हैं। यही हाल उनका है जो कीमत या ब्याज जसी चीजों को विशुद्ध आर्थिक घटना मानते हैं। बाजार का तर्क कहता है कि अगर तेल महंगा हो रहा है तो खपत का 70 फीसदी हिस्सा आयात करने वाले हमार देश में तेल के घरलू दाम भी बढ़ने चाहिए, लेकिन पेट्रोलियम सचिव ने मैड्रिड जाकर अक्तूबर तक का अभयदान दे दिया। इस बीच जो घाटा होगा, उसे ऑयल बांड जसे चतुर तरीकों से आने वाली पीढ़ियों पर लादा जाएगा। ऐसे फैसलों में कितनी अर्थनीति है और कितनी राजनीति, हिसाब लगाते रहिए। राजकोषीय अनुशासन की डफली बजाने वाले वित्तमंत्री ने 60 हाार करोड़ का लोन माफी पैकेा देकर ऐसा हिसाब लगाने का एक मौका पहले भी दिया था। सेंसेक्स जब उछलता है तो इन्हीं वित्तमंत्री समेत कई लोग सरकारी अर्थनीति को सेहरा बांधने खड़े हो जाते हैं। आज जब उसके10 हाार से नीचे जाने की भविष्यवाणियां हो रही हैं तो कोई नहीं कह रहा कि इसमें सरकार की नाकामी है। मीठा-मीठा गप, कड़वा-कड़वा थू। राजनीति के लबादे में अर्थलाभ और अर्थनीति के खोल में राजनीतिक लाभ। हुक्मरानों का सच कोई नहीं जानता। पर जनता का सच सबके सामने है। उसका सच है 11.63 प्रतिशत महंगाई, 13 फीसदी होमलोन का ब्याज और शेयर बाजार में सूचकांकों के साथ डूबता उसका लघु निवेश। रहिमन चुप होए बैठिए, देख दिनन का फेर।ड्ढr

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