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शिव-शक्ित और सौंदर्य

प्रकृति में सौंदर्य देखना और पुरुष में शिवत्व खोजना कमाल का दर्शन है। अक्सर इस दर्शन पर अभिभूत होता रहता हूं। प्रकृति ही अपने यहां शक्ित है और पुरुष है शिव। उन दोनों के बिना दुनिया नहीं चलती। शिव और शक्ित के बार में सोचता हूं तो कालिदास पर अटक जाता हूं। सबसे पहले ‘कुमारसंभव’ जेहन में आता है। कहते हैं उसको लिखने के बाद कालिदास को कोढ़ हो गया था। आखिर उन्होंने अपने आराध्य के प्रेम का बहुत ही मांसल चित्रण किया था। ऐसे भक्तों की कमी नहीं जो मानते हैं कि पहले सात सर्ग ही उनके लिखे हुए हैं। दरअसल, आठवां सर्ग ही शिव-पार्वती के प्रेम को दिखाता है। यहीं से खास किस्म के भक्तों की कवायद शुरू हो जाती है। कालिदास को कोढ़ ऐसे ही भक्तों की देन लगता है। कालिदास ने शिव-पार्वती के प्रेम का वर्णन जरूर किया है, लेकिन वह महा मांसल ही नहीं है। आचार्य हाारीप्रसाद द्विवेदी ने ठीक ही लिखा है, ‘यहां शिव कोई एक व्यक्ित नहीं बल्कि विश्वमूर्ति हैं। पार्वती निखिलभूत में व्याप्त आह्लादिनी शक्ित हैं।’ अद्भुत सौंदर्य की रचना है कुमारसंभव। पार्वती के सौंदर्य को चित्रित करने में कालिदास ने अपनी समस्त काव्य प्रतिभा लगा दी।ड्ढr -सर्वोपमाद्रव्यसमुच्चयेन यथाप्रदेशं विनिवेशितेन।ड्ढr सा निर्मिता विश्वसृजा प्रयत्नादेकस्थसौंदर्यदिदृक्षयेव।।ड्ढr यानी शायद ब्रह्मा संसार का संपूर्ण सौंदर्य एक ही जगह पर देखना चाहते थे। इसीलिए उन्होंने तमाम उपमाएं जुटा कर पार्वती को रचा। असल में शक्ित में सौंदर्य देखने की यह गजब की चाहत है। सौंदर्य भी ऐसा जो तप से निकला हो। शक्ित में सौंदर्य और वह भी तपा हुआ। पार्वती को अपने सौंदर्य की वजह से शिव नहीं मिलते। वह मिलते हैं तप करने के बाद यानी शक्ित में सौंदर्य हो और वह किसी लक्ष्य से जुड़ा हो। तब जाकर शिव मिलते हैं। तभी कल्याण होता है। कालिदास दिवस पर महाकवि को प्रणाम।ड्ढr

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