अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

दुनिया का पहला बांध विरोधी आंदोलन

पंद्रह साल पहले जब नर्मदा आंदोलन चरम पर था तो पर्यावरणविद् माधव गॉडगिल ने मुझे एक ऐसे आंदोलन के बार में बताया था जो इन आंदोलनों का पूर्वज था। 10 में जब टाटा समूह ने सरकार के सहयोग से पुणे के पास बांध बनाना शुरू किया तो मुलशी पेटा के किसानों ने इसका विरोध किया। इस संघर्ष का नेतृत्व पांडुरंग महादेव बापट कर रहे थे। वे समाजवादी और राष्ट्रवादी थे, उनकी पढ़ाई इंग्लैंड में हुई थी। मेधा पाटकर की तरह ही वे करिश्माई भी थे और साहसी भी। और उसी तरह डूबने वाली जमीन के मुद्दे पर उन्होंने अपनी पहचान किसानों जसी ही बनाई थी। माधव गाडगिल ने अपने बचपन में सेनापति बापट के नाम से मशहूर इस शख्सियत के बार में पढ़ा था। बाद में 10 में उन्होंने बापट के सहयोगी वी.एम. भश्कुटे द्वारा मुलशी सत्याग्रह पर लिखी किताब को पढ़ा। 10 में उन्हें पुणे विश्वविद्यालय में राजनीतिशास्त्र के तिलक प्रोफेसर राजेंद्र वोरा के मराठी में लिखे ऐतिहासिक अध्ययन को पढ़ने का मौका मिला। इससे वे खासे प्रभावित हुए। मेरी मदद से माधव गॉडगिल ने राजेंद्र वोरा को किताब का अंग्रेजी संस्करण निकालने के लिए प्रेरित किया। प्रोफेसर वोरा काफी व्यस्त आदमी हैं जो देश भर के राजनीतिशास्त्रियों के साथ मिलकर लोकनीति नाम का संगठन भी चलाते हैं। अपने सहयोगियों के साथ वे भारतीय लोकतंत्र पर किताब भी लिख रहे हैं। पढ़ाते तो वे हैं ही। किताब के अंग्रेजी संस्करण में उन्होंेने एक नया अध्याय जोड़ा जिसमें उन्होंने मुलशी सत्याग्रह और नर्मदा आंदोलन की तुलना की है। इस साल के शुरू में दिल का दौरा पड़ने से प्रोफेसर वोरा का निधन हो गया। इस साल के आखिर तक ‘द वल्र्ड्स फर्स्ट एंटी-डैम मूवमेंट’ नाम से यह किताब बाजार में आ जाएगी। मराठी इतिहास, भारतीय राष्ट्रीयता के इतिहास, पर्यावरण की राजनीति और किसानों के समाजशास्त्र में दिलचस्पी रखने वालों के लिए यह एक महत्वपूर्ण किताब होगी।ड्ढr किताब मुलशी क्षेत्र की कृषि अर्थव्यवस्था से शुरू होती है। वोरा हमें बताते हैं खेतों के बार में, फसलों और उनकी मंडियों के बारे में, र्का की व्यवस्था के बार में और उन धर्मस्थलों के बार में जहां गांव वाले पूजा के लिए जाते हैं। फिर उसके बाद वे बताते हैं कि अगर टाटा बांध बना लेते हैं तो उससे घाटी को क्या नुकसान हो सकता है। फिर वे मराठी सूत्रों का सही इस्तेमाल करते हुए बताते हैं मुलशी घाटी को डूब क्षेत्र में आने से बचाने के लिए हुए संघर्ष के बार में। यह संघर्ष सफल नहीं रहा था। इसमें नेताओं की भूख-हड़ताल की भी कहानी है और जनता के विरोध प्रदर्शनों की भी। फिर मुलशी के किसानों और पुणे के राष्ट्रवादी मध्यवर्ग के जटिल रिश्तों के बार में भी काफी सावधानी और कुशलता से बताया गया है। इसमें महात्मा गांधी के सत्याग्रह के प्रति हिचकिचाहट के भाव की कहानी भी है। विरोध और संघर्ष के अलावा वोरा हमारा परिचय आंदोलन के वैचारिक पक्ष से भी कराते हैं। एक तरफ बांध समर्थक हैं जिनका तर्क है कि बांध बना तो इससे लोगों को रोगार मिलेगा और यह पूर देश को समृद्ध बनाएगा, जबकि दूसरी तरफ विरोध करने वालों का कहना है कि यह बांध स्थानीय लोगों को दरिद्र बना देगा और उसका फायदा दूसर लोगों को ही मिलेगा।ड्ढr किताब का आखिरी अध्याय मुलशी सत्याग्रह और नर्मदा बचाओ आंदोलन की तुलना करता है। जब किताब के अंग्रेजी संस्करण का विचार सबसे पहले आया था तो हमने सोचा था कि इसकी शुरुआत इस तुलना से ही होगी। अब किताब का प्रूफ पढ़ने के बाद मुझे लगता है कि इसे आखिर में रखना ही ज्यादा अच्छा था। किताब में वोरा एक जगह लिखते हैं- ‘ सत्याग्रहियों की नजर से देखें तो यह सिर्फ मालवा किसानों और कंपनी के बीच का संघर्ष ही नहीं था। यह संघर्ष था अर्थव्यवस्था की दो विचारधाराओं का। जब तक सरकार यह साबित नहीं कर देती कि योजना सबके हितों के लिए जरूरी है, उसे किसी की जमीन लेने का कोई अधिकार नहीं। जब देश की सुरक्षा खतर में हो या जब कोई आपदा आ जाए तो राज्यसत्ता एक नागरिक से उसका सब कुछ मांग सकती है, लेकिन मुलशी में ऐसी कोई आपातकालीन स्थिति नहीं थी। मराठा इतिहास की गवाह रही जमीन के एक बड़े हिस्से को डुबा देना अत्याचार था, अन्याय था। यह सिर्फ इसलिए ली जा रही थी कि इससे एक निजी कंपनी का मुनाफा बढ़ाया जा सके।’ड्ढr राजेंद्र वोरा की किताब उत्कृष्ट इतिहास लेखन का एक अच्छा नमूना है, लेकिन इसके साथ ही यह वर्तमान से भी बात करती है। इतिहास की बहुत कम ही किताबें यह काम करती हैं। मुलशी का विवाद उस टकराव का पहला संकेत है जिसमें प्राचीन कृषि व्यवस्था में जी रहा घनी आबादी वाला एक क्षेत्र औद्योगीकरण की लंबी और दर्दनाक यात्रा से गुजरता है और मुलशी सत्याग्रह नर्मदा बचाओ आंदोलन का एक अग्रज भर ही नहीं है, वह सिंगुर, नंदीग्राम जसी दर्जनों जगहों पर खड़े होने वाले संघर्षो की भविष्यवाणी भी करता है। उन सभी जगहों पर जहां सरकार ने किसी एक निजी कंपनी के फायदे के लिए किसानों से उनकी जमीन छीनी है। ऐसे दूसर सभी संघर्षो की तरह ही मुलशी गांव के लिए शहर का विरोध करता है। जीवन-यापन के पक्ष में व्यापार का विरोध करता है। खेती के लिए फैक््रिटयों का विरोध करता है। आम आदमी के लिए धन पशुओं के खिलाफ खड़ा है।ड्ढr दु:ख की बात सिर्फ यही है कि यह किताब जब बाजार में आने की तैयारी कर रही है तो राजेंद्र वोरा उसे देखने के लिए जीवित नहीं हैं। हमें सिर्फ उनकी याद को बनाए रखने के लिए या उनके सम्मान के लिए ही इसे नहीं पढ़ना चाहिए, आधुनिक भारत के अतीत और भविष्य को समझने के लिए भी इसे पढ़ना जरूरी है।ड्ढr ं

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title: दुनिया का पहला बांध विरोधी आंदोलन