DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

आर्थिक सुरक्षा के बिना मानवाधिकार बेमानी: बालकृष्णन

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश केजी बालकृष्णन ने आर्थिक एवं सामाजिक अधिकारों को मानवाधिकारों का मूल बताते हुए गुरुवार को कहा कि लोगों को रोटी, कपड़ा, मकान, दवा, रोजगार दिए बिना नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों को वास्तविक स्वरूप में लागू करना संभव नहीं है। न्यायमूर्ति बालकृष्णन दक्षिण एशियाई देशों के राष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाआें के प्रथम सम्मेलन के उद्घाटन समारोह को मुख्य अतिथि के तौर पर संबोधित कर रहे थे। सम्मेलन में अफगानिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका और मालदीव की राष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाआें के प्रमुख भारत के रायों के मानवाधिकार आयोगों के प्रमुख विदेशी राजदूत एवं संयुक्त राष्ट्र के प्रतिनिधि भाग ले रहे हैं। न्यायमूर्ति बालकृष्णन ने कहा कि पारंपरिक रूप से मानवाधिकारों को नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों से जोड़कर देखा जाता है, जिनमें अभिव्यक्ित की स्वतंत्रता, मनमानी गिरफ्तारी, हिरासत में उत्पीड़न, संगठन बनाने या सभा बनाने के हक शामिल हैं। लेकिन मानवाधिकारों के व्यापक दायरे में भोजन, स्वास्थ्य, आवास, शिक्षा, रोजगार जैसे सामाजिक आर्थिक अधिकार भी आ गए हैं। उन्होंने कहा कि जब तक लोगों को सामाजिक-आर्थिक अधिकार नहीं मिल जाते तब तक मानवाधिकारों को वास्तविकता में लागू करना संभव नहीं है और यदि ऐसा होता है तो जनता के लिए यह कष्टप्रद सपना बनकर रह जाएंगे। मुख्य न्यायाधीश ने मानवाधिकार संस्थाआें से कहा कि इस स्थिति में न्यायपालिका एवं मानवाधिकार संस्थाआें के दायित्व के अंतर्गत सरकार के कामकाज की निगरानी के साथ-साथ नागरिकों में जागरुकता फैलाना भी आता है। उन्होंने मानवाधिकार संगठनों को सामाजिक सुधारों को भी आगे बढ़ाने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि जाति आधारित अस्पृश्यता, बंधुआ मजदूरी, बाल मजदूरी, महिलाआें के प्रति हिंसा, औरतों की खरीद फरोख्त और उन्हें बलपूर्वक वेश्यावृति के लिए मजबूर करना जैसी बुराइयां 21 वीं सदी की दास प्रथा के स्वरूप हैं। जिनका समाज में कोई स्थान नहीं होना चाहिए।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title: ‘रोटी-कपड़ा-मकान के बिना मानवाधिकार बेमानी’