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मौत का इंतजार करती डील को सियासी संजीवनी

देश में मंहगाई आसमान छू रही है, जिसको लेकर ज्यादा चर्चा नहीं है। अगर चर्चा का कोई मुद्दा है तो अभी है अमेरिका के साथ परमाणु करार। इसको लेकर जो बवाल पिछले कुछ दिनों से खड़ा हुआ है, वह और अधिक बढ़ता ही नजर आ रहा है। इससे न सिर्फ सरकार के भाग्य को लेकर सवाल खड़ा हो गया है बल्कि आने वाले चुनावों को देखते हुए पार्टियों के बीच गठजोड़ भी शुरू हो गया है। एक तरफ जहां कांग्रेस की विरोधी समाजवादी पार्टी आने वाले लोकसभा चुनाव को देखते हुए कांग्रेस के साथ आती दिख रही है। वहीं दूसरी तरफ यूनाइटेड नेशनल प्रोग्रेसिव एलाइंस (यूएनएपी) ने यह साफ कर दिया है कि अगर समाजवादी पार्टी करार का समर्थन करती है तो उसके लिए यूएनएपी में कोई जगह नहीें है। हालांकि समाजवादी पार्टी ने यह साफ कर दिया है कि वह परमाणु करार मुद्दे पर सरकार के साथ है। इस राजनीतिक खेमेबंदी के बीच भारतीय जनता पार्टी ने भी यूएनएपी को अपने करीब लाने का प्रयास तेज कर दिया है। भाजपा नेता जसवंत सिंह ने कहा कि उनकी पार्टी ने यूएनपीए को केंद्र में सरकार बनाने के लिए कहा था। भाजपा ने बहुजन समाज पार्टी से भी नजदीकी बढ़ानी शुरू कर दी है। वाम दलों का भी परमाणु करार पर इतने तीखे विरोध का कारणउसका अपना वोट बैंक ही है। वाम दलों की नीति हमेशा से ही अमेरिका विरोधी रहा है। डील मुद्दे पर वह सरकार का साथ देकर किसी सैद्धांतिक उलझाव में नहीं पड़ना चाहता। आने वाले चुनावों में वह ऐसे सैद्धांतिक उलझाव के साथ कतई नहीं जाना चाहेगा, जिसका वह हमेशा से विरोध करता रहा है। जिस परमाणु करार के विरोधी इसकी मौत का फरमान लिखने के लिए बेताब था वह फिर से पुनर्जीवित होता दिख रहा है,साथ ही यह घरेलू राजनीति को भी तय कर रहा है। समस्त पार्टी इसी को केंद्र में रखकर अपना समीकरण बिठाने में लग गए हैं। अमेरिका के स्वतंत्रता दिवस के मौके पर आयोजित एक कार्यक्रम में भारत में अमेरिकी राजदूत मलफोर्ड तथा कार्यक्रम में मौजूद भारत के विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी दोनों के ही चेहरे पर आशा साफ नजर आ रही थी। प्रणब मुखर्जी ने मलफोर्ड की सराहना करते हुए कहा कि वह न सिर्फ अमेरिकियों की स्वतंत्रता के लिए अपनी आवाज उठाते हैं, बल्कि दूसरों की स्वतंत्रता के लिए भी फिक्रमंद रहते हैं।

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