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नया मीडिया, पुराने कोर्स

हाल में एक बड़ी सीरियल निर्माता कंपनी ने पत्रकारिता विश्वविद्यालय और कॉलजों मंे जाकर स्क्रिप्टराइटर ढूंढ़ने शुरू किए। उसे सौ स्क्रिप्टराइटर की जरूरत थी। सौ का आंकड़ा बहुत बड़ा नहीं होना चाहिए, जब पत्रकारिता स्कूल-कॉलज लगभग हर बड़े शहर में थोक के भाव खुल हांे। वैसे सीरियल की स्क्रिप्टराइटिंग अलग किस्म का हुनर है। क्रिएटिव क्षमताऐं इसमें अलग किस्म की चाहिऐं। जो टेस्ट हुआ, उसमें छात्रों का एक प्लाट दिया गया, उन्हें प्लाट को आगे बढ़ाना था। प्लाट यह था कि एक प्रेमी और प्रेमिका अफयर में हैं, शादी से पहले ही प्रेमिका प्रेगनेंट हो जाती है। प्रेमी मर जाता है। प्रेमी का भाई जो पहल ही शादीशुदा है, अपने भाई की प्रेगनंेट प्रेमिका को बचाने, संभालने आता है। प्रेमी के भाई को अपने दिवंगत भाई की प्रेगनेंट प्रेमिका से अफेयर हो जाता है। इस सीरियल का आगे कैसे बढ़ाया जाए। टेस्ट इस बात का था। यहां यह बहस अलग है कि इस तरह के सीरियल किस किस्म के मूल्यों का समाज में प्रमोट करेंगे। पहला महत्वपूर्ण सवाल यह है कि जिस रोजगार में सैकड़ों लोगों की जरूरत है, उस रोजगार की ट्रनिंग की विधिवत व्यवस्था हमारे मीडिया कार्स में नहीं है। मनोरंजन उद्योग के लिए स्क्रिप्ट लेखन का काम सिखाने वाले कार्स न के बराबर हैं, लेकिन स्क्रिप्ट राइटिंग के हुनर का कौन से कार्स में पढ़ाया जाय। पत्रकारिता के कार्स मंे या लिटरचर में या फिर एक नया ही कार्स हो। इधर एक पत्रकारिता विश्वविद्यालय के छात्रों ने बताया कि उनके यहां जिन छात्रों ने प्रिंट जर्नलिज्म का कार्स किया है, वो टीवी में नौकरी कर रह हैं और जो ब्रॉडकास्ट जर्नलिज्म का कार्स करके गये थे, उनमें कई को अखबारों में नौकरी मिली है। प्रिंट, ब्रॉडकास्ट, और सबका एक साथ समेटता इंटरनेट जर्नलिज्म, इनमें कौन जाएगा? पता नहीं। भोपाल में एक साथ कई अखबारां की लांचिंग हुई है, यहां सबको अखबार में नौकरी मिली है। कोर्स चाहे ब्रॉडकास्ट का किया हो, या प्रिंट का। मीडिया में कनर्वजस चल रहा है, कोर्स में अभी यह दूर-दूर तक नहीं है। टीवी वाले को कल वेबसाइट पर काम करना पड़ सकता है। वेबसाइट वाला प्रिंट में जा सकता है। सरकारी विश्वविद्यालयों और कॉलजों में पत्रकारिता के कोर्स को बदलने मंे बहुत समय लग रहा है। बच्चे कोर्स तो कर रहे हैं, पर सीरियल कंपनियों के टेस्ट में फल हो रह हैं। कैंपस में जो रोजगार देने वाले आ रह हैं, वो कह रह हैं, बच्चे ऐसे चाहिए, जो फैशन, लाइफ स्टाइल, टेक्िनकल उत्पादों की गहरी समझ रखते हों। प्रिंट मीडिया में आजकल सबसे ज्यादा फाकस फीचर पेजों पर है। फीचर एक अखबार को दूसरे अखबार से अलग कर रहा है। फीचर में भारी निवेश हुआ है। फीचर के लिए लोग चाहिए। मोबाइल पर रेगुलर कॉलम चाहिए। आटोमोबाइल पर रेगुलर कॉलम चाहिए। फैशन को लगातार समझने वाले लोग चाहिए। ये विषय अभी पत्रकारिता के कोसरे में नहीं आए। मोबाइल फोन पर हिंदी और अंग्रजी में पत्रिकाएं निकल रही हैं और लाखों में बिक रही हैं। लगभग हर अखबार मोबाइल पर नियमित कालम छाप रहा है। मोबाइल पत्रकारिता के लिए कितना महत्वपूर्ण विषय है, इस प्रोफसरों का समझाना बहुत मुश्किल काम है। आटोमोबाइल का नयी पत्रकारिता में क्या स्थान है, यह प्रोफसरों की चिंता का विषय नहीं है। आध्यात्मिक पत्रकारिता अब एक बहुत बड़ा क्षेत्र है, पर इस विधिवत कहीं नहीं पढ़ाया जाता। एक रेडिया चैनल पर संस्कृत के आध्यात्मिक श्लोक एक एंकर पढ़ती है, तो समझ नहीं आता है कि ये आध्यात्मिक कार्यक्रम कर रही है या उसकी कॉमडी। मीडिया इतनी तेजी से बदल गया है, उसकी रफ्तार से अगर कार्स नहीं बदलेंगे, तो वे अप्रासंगिक और निर्थक हेा जायेंगे। हो ही रहे हैं। कोर्स हर साल रिवाइज होन चाहिए। राजनीति, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र और भाषा के बुनियादी पचरे क साथ हर मीडिया की न्यूनतम जानकारी हो, फिर एक खास मीडिया का स्पेशलाइजशन हेा-प्रिंट, टीवी और आनलाइन। पर बात यहां खत्म नहीं हानी चाहिए। मुख्य कार्स के साथ ऐड ऑन कोर्स होने चाहिए। आर्थिक पत्रकारिता, फैशन पत्रकारिता, मनारंजन उद्योग के लिए स्क्रिप्ट राइटिंग, आध्यात्मिक पत्रकारिता-बच्चो जितने चाहे, उतने ऐड ऑन कार्स कर, अपने ज्ञान को व्यापक करे। ये ऐड ऑन कार्स इतने फ्लैक्िसबल होने चाहिए कि हर महीने उनमें बदलाव किया जा सके। एक जमाने में प्रबंधन के कोर्सो में मोटे तौर पर चार स्पेशलाइजशन होत थे-प्रोडक्शन, मार्कटिंग, मानव संसाधन, और वित्त। पर जैसे समय बदला, इंटरनशनल बिजनेस, आईटी समेत नयी विशेषज्ञताऐं आईं और प्रबंधन के छात्रों को प्रोत्साहित किया गया है कि एक से ज्यादा क्षेत्रों में विशेषज्ञताऐं हासिल कर लें। मीडिया पर बहुत चर्चा हो जाती है, पर मीडिया शिक्षा पर बात नहीं होती है।ं

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