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अमरनाथ भी जाता हूं, चरार शरीफ भी

असम में छह साल और पांच साल तक कश्मीर में गवर्नर के पद पर रहे लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर) एस.के. सिन्हा रणभूमि के भी योद्धा हैं। पटना साइंस कॉलेज से 1में ग्रेजुएशन करने के बाद उन्होंने सेना में नौकरी शुरू की। पदोन्नति पर विवाद के चलते वे राजनीति में आ गए। नेपाल में उच्चायुक्त भी रह चुके हैं। राज्यपाल पद से ठीक विदाई के वक्त अमरनाथ बोर्ड को लेकर विवाद में आए सिन्हा से रूबरू हुए विशेष संवाददाता विवेक शुक्ला। सुना है कि आप कोई किताब लिख रहे हैं? जाहिर है कि पहले की तरह से तो बिजी नहीं रहूंगा। हां, किताब लिख रहा हूं। उसमें अमरनाथ विवाद से जुड़े सभी पहलुओं का विस्तार से खुलासा होगा। आप पर आरोप लग रहा है कि आपने राज्य को साम्प्रदायिकता की आग में झोंक दिया? मुझे इस बात का अफसोस है कि अमरनाथ बोर्ड को दी गई जमीन को देने के बाद उठे बवाल को साम्प्रदायिकता रंग चढ़ाने की कोशिश हुई। इसे हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच विवाद के रूप में पेश किया गया, जबकि मैं मानता हूं कि वहां पर आमने-सामने इस्लामिक कट्टरपंथी और राज्य का आवाम था। मैं उस जनता की बात कर रहा हूं जो आतंकियों के हमले से भय के चलते अलगाववादियों और कट्टरपंथियों के खिलाफ नहीं बोले। मुझे यकीन है कि वहां पर शांति बहाल हो जाएगी। आरोपों पर कमेंट नहीं करना चाहता। आपके रिश्ते मुफ्ती मोहम्मद सईद से शुरू से ही काफी तनावपूर्ण रहे। मैं मुफ्ती और उनकी पार्टी को घोर देश विरोधी मानता हूं। उनकी सारी गतिविधियां देश विरोधी रहती हैं। हैरानी तो इस बात की है कि इसके बावजूद मुफ्ती को दिल्ली में बैठे सियासी रहनुमा अपना बहुत करीबी मानते हैं। उन्हीं के दबाव के चलते अमरनाथ बोर्ड खत्म हो गया। इस बवाल की वजह क्या है?

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  • Web Title: अमरनाथ भी जाता हूं, चरार शरीफ भी