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अजूबे से आगे

औरत से मर्द बन गए अमेरिका के थॉमस बेटी पर संपादकीय लिखना एक कठिन काम है। उसे कैसे संबोधित करं? मर्द की तरह या औरत की तरह? सैक्स चेंज के बाद किसी को उसकी नई पहचान से ही पुकारा जाना चाहिए, लेकिन बेटी ने तो मर्द का रूप धरने के बाद बाकायदा नौ महीने के लिए गर्भ धारण किया और एक कन्या को जन्म दिया। अब उसे मां कहें या पिता? यह समस्या भाषाशास्त्र की नहीं समाजशास्त्र की है, जिसे लेकर मीडिया ही नहीं राज-समाज की कई संस्थाएं और अवधारणाएं उलझन में पड़ गई हैं। बेटी के मां या पिता बनने को विज्ञान के चमत्कार की तरह पेश किया जा रहा है जो यह वास्तव में है नहीं। उसका औरत से मर्द बनना और फिर गर्भ धारण कर स्वस्थ संतान को जन्म देना आधुनिक तकनीक और शल्य चिकित्सकों का कमाल है, इसमें सीधे विज्ञान की भूमिका बहुत ज्यादा नहीं है।फिर यह सब हमार समाज या सभ्यता की किसी समस्या का समाधान भी नहीं पेश करता, उनके सामने बहुत सार सवाल जरूर खड़े करता है। आधुनिक नारीवाद में कई बार यह सवाल उठाया गया है कि जन्म देने की सारी पीड़ा औरत ही क्यों सहे। बेटी का उदाहरण इसका कोई हल नहीं देता, क्योंकि अंतत: है तो वह औरत ही। यह जरूर कहा जा रहा है कि इसके बाद संतान को जन्म देने का काम कम से कम जेंडर आईडेंटिटी से जोड़कर नहीं देखा जा सकेगा। मुमकिन है कि ऐसा हो लेकिन जब भी यह बात आएगी तो बेटी की जेंडर आईडेंटिटी पर एक प्रश्नचिह्न् भी नत्थी ही रहेगा। इस सैक्स चेंज और उसके बाद के गर्भधारण को अमेरिका में व्यक्ित की च्वाइस के अधिकार की तरह पेश किया जा रहा है, लेकिन इससे कई कानूनी समस्याएं खड़ी हो गई हैं। पहली नवजात कन्या के जन्म प्रमाणपत्र को लेकर है जिसमें माता-पिता के अलावा गर्भ धारण करने वाली औरत का नाम भी होता है यानी एक ही दस्तावेज में बेटी पुरुष भी होगी और औरत भी। समस्या यह भी है कि इस बच्चे की दो बॉयोलॉजिकल मां हो जाएंगी। बात सिर्फ इतनी है कि च्वाइस तो अपनी जगह है लेकिन न फिलवक्त इसके लिए समाज तैयार है और न कानून।

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