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अपने-अपने ब्रांड

ानता का भलाड्ढr ओबामा जसी संभावित घटनाओं की भविष्यवाणी करने वाले ज्योतिषियों को चाहिए कि अगला आतंकी बम कहां फटेगा, यह बताकर जनता का भला करंे।ड्ढr अपने-अपने ब्रांडड्ढr ‘दिलोदिमाग पर छा गए हैं ये ब्रांड’ देख कर लगा कि ये ब्रांड धनी उपभोक्ता के लिए ज्यादा बने थे। गरीब व मध्यम वर्ग के ब्रांड यहां पर नदारद थे, जिसमें- गर्मी का तोहफा- रूहआफाा, कॉलगेट, एटलस, नौलखा साबुन, डालडा, शिप की माचिस, झंडूबाम, फ्रंटियर बिस्कुट, लिज्जत पापड़, मिल्कफूड देसी घी, गोदरा फ्रिा, टाटा नमक इत्यादि ब्रांड भी आज तक उचित पायदान पर खड़े हैं। इसी दौरान ‘शोले’ फिल्म के मुकाबले ‘जय संतोषी मां’ फिल्म ने कम बजट में अद्भुत लाभ कमाया था और फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ तो अमर फिल्म बन गई है।ड्ढr राजेन्द्र कुमार सिंह, रोहिणी, दिल्ली ड्ढr परमाणु करार देशहित मेंड्ढr भारतीय अर्थव्यवस्था के तेजी से विकास के लिए ऊरा जरूरत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। परमाणु करार देशहित में है। प्रधानमंत्री को चाहिए कि वामदलों के लाख विरोध के बावजूद इस पर अमल करं।ड्ढr संतोष कुमार रॉय, नई दिल्ली ड्ढr निखिल दा का व्यक्ितत्वड्ढr ‘निखिल चक्रवर्ती : दसवीं पुण्यतिथि पर सस्नेह स्मरण’ । आज की आपाधापी के बीच एक कृतज्ञ संपादक द्वारा एक न्यायपरक जीवन दृष्टि रखने वाले मनमौजी, घुमक्कड़, प्रकृति प्रेमी, मिलनसार और पत्रकारिता के उच्चतम मानदंडों को जीवन में आत्मसात करने वाले महान संपादक निखिल चक्रवर्ती को अपनी शब्दांजलि से सस्नेह स्मरण किया जाना इस बात का शुभ संकेत है। भारतीय पत्रकारिता के उज्वल स्तंभ निखिल दा का व्यक्ितत्व एवं कृतित्व सचमुच एक संस्था है।ड्ढr दयानंद वत्स, गांव बरवाला, दिल्लीड्ढr परिसर के सचड्ढr दिल्ली विश्वविद्यालय में आजकल नए छात्र-छात्राओं का प्रवेश हो रहा है। कई विद्यार्थियों के लिए इस विश्वविद्यालय में पढ़ना सपना सच होने जसा होता है, लेकिन जसा कि अक्सर होता है, सपना जब सच बनकर रू-ब-रू होता है तो ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं’ जसे मुहावरों का अर्थ ज्यादा समझ में आने लगता है। स्नातक स्तर तक की पढ़ाई जहां कालेज में होती है, वहां तो सुहावनेपन का भ्रम बरकरार रहता है लेकिन परास्नातक या शोध के स्तर पर जब विद्यार्थियों का सामना एक लापरवाह प्रशासन और गैर-ािम्मेदार शिक्षा तंत्र से होता है तो कई भ्रम टूट जाते हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय में आज भी बुनियादी सुविधाओं का नितान्त अभाव है। भारी मात्रा में विद्यार्थी दूर-दराज के ग्रामीण, कस्बाई और छोटे शहरों के परिवेश से यहां आते हैं, लेकिन छात्रावासों के अभाव में खुद को रक्तपिपासु मकान मालिकों और प्रॉपर्टी डीलरों के चंगुल में पाते हैं।ड्ढr नीलाम्बुज सिंह, दिल्ली वि.वि. ड्ढr जिसे हम मां कहते हैंड्ढr गंगा नदी को विलुप्त होने से बचाने के लिए प्रोफेसर जी. डी. अग्रवाल 13 जून से आमरण अनशन पर हैं। गंगोत्री से उत्तरकाशी तक गंगा नदी पर बने बांधों ने इसका अविरल और अलौकिक स्वरूप समाप्त कर दिया है, जिसे हम मां कहते हैं उसे हम सुखा देते हैं, चाहे वो गाय हो या गंगा। गांवों में रहने वाली मां भी अपने बच्चों को खिला कर खुद भूखी रहती है।ड्ढr ओम प्रकाश त्रेहन, मुखर्जी नगर, दिल्ली

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