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यूनिवर्सिटी के पैरलल खड़ा किया था तंत्र

रांची यूनिवर्सिटी में पीएचडी घोटाले से जुड़े कथित शिक्षाविदें ने विवि के समानांतर पूरा फराी तंत्र खड़ा कर लिया था। ये फराी काम पूरी प्रक्रिया के साथ किये जाते थे। वे शोधार्थियों को नियमित रूप से पंजीयन की सूचना देने के साथ रिसर्च थेसिस जमा करने से पहले और बाद में सेमिनार करवाते थे। विशेषज्ञों को वाइवा परीक्षा के लिए पत्र भेज कर आमंत्रित किया जाता और उन्हें भुगतान भी किया जाता। सबसे अंत में शोधार्थी को रिाल्ट फिर पीएचडी की डिग्री दी जाती। फर्क सिर्फ इतना था कि सर्टिफिकेट फराी होते और इन पर हस्ताक्षर जाली। इनमें परीक्षा नियंत्रक से लेकर विभागाध्यक्ष तक के हस्ताक्षर जाली होते थे।ड्ढr यह काम इतनी सफाई से होता था कि परीक्षार्थी को आभास तक नहीं होता था कि उसे फराी डिग्री मिली है।ड्ढr इस पूर काम के लिए शोधार्थी से 35 से 50 हाार रुपये तक लिये जाते थे। लगभग जून 2002 तक यह सिलसिला चला। दरअसल इस काम में लिप्त लोग इतने शातिर थे कि यूनिवर्सिटी के कुछ अधिकारी और कर्मचारियों से भी उनकी सेटिंग थी। 1तक हिंदी के प्रो बालेंदू शेखर तिवारी विभाग के पीएचडी समन्वयक थे। इसी दौरान इस घोटाले की शुरुआत हुई। पीएचडी की सारी संचिकाएं उनके पास रहती थीं। इसका उन्होंने भरपूर फायदा उठाया। दूसर शहरों में अपने संपर्क सूत्रों के माध्यम से पीएचडी एवं डीलिट करने के इच्छुक छात्रों से संपर्क कर की फराी डिग्रियां बेची। कहा जाता है कि उनके पास रांची विवि के विभागाध्यक्ष, डीन के फराी हस्ताक्षर, सर्टिफिकेट और मुहर थे। इस काम में जलगांव के सुरश महेश्वरी एवं जोधपुर के नंदलाल कल्ला उनके सहयोगी रहे।ड्ढr अब तक सिर्फ निलंबित हैं प्रो तिवारीड्ढr पीएचडी फराी डिग्री के मुख्य आरोपी प्रो बालेंदू शेखर तिवारी अब तक सिर्फ निलंबित हैं। इस घोटाले में उनकी दो बार गिरफ्तारी हो चुकी है। मामले में सीबीआइ जांच भी चल रही है। 2003 में उन्हें निलंबित किया गया था। बावजूद इसके उन्हें बर्खास्त नहीं किया गया और न ही विवि की ओर से उन पर कोई मुकदमा दर्ज हुआ। दो जुलाई को पकड़ी गयी फराी डिग्री के मामले में भी यूनिवर्सिटी की ओर से अब तक कोई प्राथमिकी दर्ज नहीं करायी गयी है।ड्ढr 50 शोधार्थियों का रािस्ट्रेशन नहीं थाड्ढr वर्ष 2002 में पीएचडी घोटाले का पर्दाफाश होने के बाद प्रो बालेंदू शेखर तिवारी के अधीन शोध कर रहे छात्रों की जांच की गयी तो पता चला कि इनमें 50 छात्रों का पंजीयन ही नहीं है। ये सभी छात्र रांची के बाहर के थे, जो अगले कुछ महीनों में फराी डिग्री घोटाले का शिकार बनते। वर्ष 2002 में प्रो तिवारी द्वारा पटना के एक व्यक्ित को एक फराी सर्टिफिकेट भेजा गया था। इस पर तत्कालीन विभागाध्यक्ष के हस्ताक्षर थे। बाद में यह सर्टिफिकेट पकड़ा गया और इससे ही इस घोटाले का खुलासा हुआ।

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