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पहले चरण का विश्वास

ाम्मू से लेकर केरल तक। तकरीबन एक चौथाई भारत की पसंद-नापसंद इलेक्ट्रनिक वोटिंग मशीनों में बंद हो गई है। आमचुनाव के पहले चरण में आज जिन 14 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं को अपने वोट डालने थे, उन्हें उसी तरह स्थानीय समस्याओं से लेकर राष्ट्रीय सरोकारों तक से जूझना था, जसे अगले चार और चरणों में बाकी भारत के लोग जूझेंगे। इसमें जम्मू विधानसभा क्षेत्र के वे इलाके भी हैं, जहां मतदाताओं को आतंकवादी खतरे के बीच वोट डालने की कतार में खड़े होना था। बिहार, झारखंड और छत्तीसगढ़ के कई इलाकों में तो जब लोग वोट डाल रहे थे तो पड़ोस में ही नक्सलियों से मुठभेड़ की गूंज भी सुनाई दे रही थी। उड़ीसा में नक्सलियों ने तीन पोलिंग बूथ में आग लगा दी। छत्तीसगढ़ में पांच चुनाव अधिकारियों को अपनी जान गंवानी पड़ी और कई जवान भी इसलिए शहीद हो गए कि मतदान के इस पर्व पर कोई आंच न आए। फिर अरुणाचल प्रदेश के वे इलाके भी जहां बर्फ अभी पूरी तरह पिघली नहीं है और कई मतदाताओं को कड॥कड़ाती ठंड की सिहरन वाली सुबह मतदान केंद्रों में पहुंचना पड़ा होगा। ये वे अड़चनें हैं जिन्हें हम दूर बैठकर सोच और समझ सकते हैं। बहुत मुमकिन है कि 17 राज्यों की 124 लोकसभा सीटों के लिए बने पौने दो लाख से भी ज्यादा पोलिंग स्टेशंस पर कई ऐसे स्थानीय मुद़्दे और बाधाएं हों, जिनकी हम दूर से कल्पना भी नहीं कर सकते। इसके बाद भी अगर 50 प्रतिशत से ज्यादा लोग वोट डालने के लिए पहुंचते हैं तो सिर्फ यही कहा जा सकता है कि भारत ने पहली बाजी जीत ली है। वैसे यह मतदान का पहला अनुमान है और देर रात में जब इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीने सीलबंद होकर सुरक्षित ठिकानों पर पहुंचेगी, तब जो मतदान के अंतिम आंकड़ें आएंगे वे इससे ज्यादा ही होंगे। अगर मतदान में बाधा पहुंचाने वालों के प्रति कोई दुर्भावना न भी रखें, और इसी तरह से सोचे कि वे कुछ वाजिब समस्याओं को उठाते हुए एक अलग किस्म के आदर्शवाद के साथ खड़े हैं। और उनकी खड़ी की गई सारी बाधाओं और खतरों के बावजूद लोग अगर वोट डालने आ रहे हैं तो इसका अर्थ सिर्फ इतना ही है कि तमाम खामियों के बावजूद आम लोगों का विश्वास वोट की ताकत पर खड़े लोकतंत्र में ही है। बंदूक उठाने वालों में नहीं। दिल्ली की सत्ता चलाने वाला लोकतंत्र अगर दांतेवाड़ा में भी जीत रहा है तो यह कोई छोटी बात नहीं है।

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