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राजरंग

हमको भी गम ने मारा, तुमको भी..मोहतरमा की अभी कुछ ही दिनों तक क्या चलती थी। लोग मैडम-मैडम कहते नहीं थकते थे। हर पूर विभाग में उनकी तूती बोलती थी। हर कोई आकर उनका स्वास्थ्य पूछता था। क्या अधिकारी और क्या कर्मचारी सभी हाथ जोड़े रहते थे। बुरा हो वक्त का, जो हाकिम बदल गये और मोहतरमा तन्हा हो गयीं। अब तो दिन बस यूं ही कट रहे हैं। पर आज भी आंखों में वही सपने बसते हैं। राजधानी के निकट टाटा-रांची मार्ग पर बने ऑफिस में जब हाकिम पहुंचते थे , तो उनका रुतबा देखने लायक होता था। वे हाकिम के कमर में बेरोक-टोक जातीं थीं। सभी अपना काम कराने के लिए उनके ही आगे-पीछे होते। मैडम भी पूर फॉर्म में रहतीं। ठसक भी मेम साहबों वाली हो गयी थी। पर कहते हैं कि सुख के दिन काफी छोटे होते हैं। साहब बदल गये और मेम साहब को तो अब इंतजार है कि किसी तरह ये दुख भर दिन बीते। न जाने कब उनके दुख के दिन खत्म होंगे? हर रात के बाद सबेरा आता है। उसी सबेर के इंतजार में मोहतरा के दिन कटेंगे शायद..।

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