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बीआईटी सिंदरी: बिहार-झारखंड बातचीत कर मामला सुलझाएं

बीआईटी सिन्दरी में पढ़ने वाले बिहारी छात्रों के उवल भविष्य के लिए बिहार एवं झारखंड सरकार बैठकर आपस में बातचीत कर मामले को सुलझाए अन्यथा बाध्य होकर अदालत को कोई फैसला लेना होगा। मंगलवार को पटना हाईकेार्ट ने झारखंड राज्य की ओर से दायर अवमानना मामले पर सुनवाई की।न्यायमूर्ति नवीन सिन्हा की एकलपीठ को बताया गया कि बीआइ्रट्री सिन्दरी में पढ़ने वाले बिहारी छात्रों का खर्चा बिहार सरकार नहीं दे रही है।ड्ढr ड्ढr अदालत को यह भी बताया गया कि दो दिसम्बर 2005 को अदालत ने बिहार सरकार को करीब 18 करोड़ रुपये की भुगतान करने का आदेश दिया था। जिसके बाद बिहार ने झारखंड को कुछ रुपये की भुगतान कर दिया। अवमानना मामला दायर होने के बाद भी सरकार ने रुपये की भुगतान किया लेकिन अभी भी रोड़ 68 लाख से ज्यादा रुपया बकाया है। जिसका भुगतान अब तक नहीं किया गया है। अदालत ने मामले को तीन सप्ताह के लिए टालते हुए दोनों सरकारों को आपस में मिल बैठ कर बातचीत कर मामला को सलटा लेने की बात कही। साथ ही यह भी कहा कि यदि समस्या का समाधान नहीं होता है तो अदालत अवमानना अर्जी पर सुनवाई कर अपना फैसला देगी।ड्ढr ड्ढr कृषि क्षेत्र में पीपीपी को बढ़ावा जरूरी : सदामतेड्ढr पटना (हि. ब्यू.)। देश की कई बड़ी कंपनियां बिहार में कृषि क्षेत्र में निवेश करना चाहती हैं। राज्य सरकार को इस क्षेत्र में पीपीपी को बढ़ावा देना चाहिए। कृषि विकास जसे बड़े लक्ष्य को इसके बिना हासिल करना कठिन काम है। ये बातें योजना आयोग के कृषि सलाहकार डा. वी.वी. सदामते ने मंगलवार को पटना में कही। उन्होंने कहा कि सिंहानिया फाउन्डेशन बिहार में कम से कम दस सघन पशु विकास केन्द्र खोलने के लिए तैयार है। सरकार को संभावनाओं को देखते हुए निजी कंपनियों से बात करनी चाहिए। उधर श्री सदामते के साथ राज्य में पहुंची स्पेशल टास्क फोर्स की कॉप्टेड सदस्य संदीपा कनेटकर ने कहा कि बिहारवासियों को पता नहीं है कि वे सोने की खान पर बैठे हैं। यहां की मिट्टी सोना उगलने वाली है। लेकिन आश्चर्य है कि यहां जविक खेती के लिए जिस प्रकार अभियान चलना चाहिए, वह नहीं चल रहा है। यही हाल देश के अन्य राज्यों में भी है। जविक खेती तबतक नहीं जोर पकड़ सकती जबतक किसानों के उत्पाद की ब्रांडिंग न हो।ड्ढr ड्ढr जसे दार्जलिंग की चाय ब्रांडिंग के बाद चमक गई उसी तरह बिहार की लीची की भी ब्रांडिंग करनी चाहिए। जविक खेती से प्राप्त उत्पादों का सर्टिफिकेसन भी सरकार कर तो उनके उत्पादों की कीमत बढ़ जायेगी। लागत तो उसमें कम लगती ही है, स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भी लाभदायक होता है। फिर कोई सवाल नहीं उठता कि किसानों की रुचि ऐसी खेती में न बढ़े। उन्होंने कहा कि जविक खाद के उपयोग के पहले भी मिट्ी की जांच करानी होती है। दस रुपये की खाद की जहां जरूरत हो किसान वहां एक सौ रुपये की खाद डालते हैं । मिट्टी जांच से उन्हें इसका अंदाजा लग जायेगा।

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