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यूपीए+सपा-लेफ्ट = आर्थिक सुधार

इंडस्ट्री और अर्थशास्त्रियों की पूछें तो उनकी तो सोई उम्मीदें जागने लगी हैं। अर्थविदों और कॉरपोरेट जगत का एक समूह साफ तौर पर मान रहा है कि वाम दलों की विदाई अर्थव्यवस्था के लिए शुभ संकेत है और अब आर्थिक सुधारों की गति तेज होगी। हालांकि कुछ विशेषज्ञों और कारपोरेट हस्तियों का एक ऐसा धड़ा भी है जो मानता है कि वाम की अड़ंगेबाजी हटने के बावजूद स्थिति बहुत नहीं सुधरेगी क्योंकि चुनावी दौर होने के नाते सरकार यादा जोखिम लेने की हालत में नहीं है। यूपीए सरकार ने सत्तारूढ़ होते ही न्यूनतम साझा कार्यक्रम में विनिवेश के साथ बैकिंग, श्रम और बीमा क्षेत्र के सुधारों को तेज करने की बात कही थी। इन क्षेत्रों में तो सुधारों की प्रक्रिया वामदलों के अवरोध के चलते आगे नहीं बढ़ सकी। वहीं दूसरी ओर हाल ही में बहुब्रांड रिटेलिंग में एफडीआई को लेकर भी वामदलों की तिरछी भौहें आड़े आ गईं थीं। बहरहाल अब विशेषज्ञों और कॉरपोरेट जगत का एक समूह मान रहा है कि श्रम कानून को छोड़ सरकार कम से कम अन्य बचे हुये सुधार एजेंडे को आगे बढ़ा सकेगी।

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