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चाोड़-तोड़ का दौर

वामदलों के समर्थन वापस लेने पर संप्रग सरकार अल्पमत में आ गई है और अपना अस्तित्व बचाने के लिए उसे अनेक छोटे-छोटे दलों के सहारे की जरूरत है। इसके लिए नैतिक-अनैतिक समझौते भी करने पड़ सकते हैं क्योंकि संकट के मद्देनजर वे अपने संकीर्ण हित साधने में भला क्यों चूकेंगे? फिलवक्त, संकट का मूल कारण प्रस्तावित भारत-अमेरिकी परमाणु समझौता है, जिसके बारे में सरकार आगे बढ़ना चाहती है, पर वामदल इसके खिलाफ हैं। 3लोकसभा सदस्यों वाली सपा ने यह कहकर मनमोहन सरकार को समर्थन देने की घोषणा की है कि परमाणु करार देश-हित में है। फिर भी, बहुमत का आंकड़ा दूर है। इसलिए, राष्ट्रीय लोकदल, एमडीएमके, टीआरएस, नेशनल कॉन्फ्रेंस, तृणमूल कांग्रेस, निर्दलीय सांसदों आदि की पौ-बारह है। उन्हें मनाने-पटाने में सरकार के संकटमोचक सक्रिय हो गए हैं। यह अफवाह हवा में है कि सपा के कुछ सांसद परमाणु करार के पक्ष में नहीं हैं, इसलिए शायद वे संप्रग सरकार को समर्थन न दें। बहुमत का फैसला लोकसभा पटल पर होगा, पर जोड़-तोड़ से सरकार बचाना लोकतंत्र की कैसी निशानी है? यह सवाल मौजूं है क्योंकि गठबंधन राजनीति के दौर में सरकार को समर्थन देने वाले कई नेता अपने संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थ पूर करने का प्रयास करते हैं। कम मामलों में ही समान विचारधारा के आधार पर गठबंधन सरकारें बनाई जाती हैं। विभिन्नताओं से भर भारत में राष्ट्रीय दल क्षेत्रीय आकांक्षाएं पूरी न कर पाएं तो क्षेत्रीय दलों का उदय अवश्यंभावी हो जाता है और गठबंधन सरकार के लिए जोड़-तोड़ राजनीतिक मजबूरी बन जाती है। इस पर काबू पाना तभी संभव है, जब राजनीतिक संस्कृति परिपक्व हो, राष्ट्रीय पार्टियों का व्यापक जनाधार हो और गठबंधन सरकार से उपजने वाली विकृतियों के बार में जनता सचेष्ट हो। यदि राष्ट्रीय स्तर पर जनता को कोई सक्षम विकल्प नजर नहीं आता है तो वह छोटे दलों की तरफ मुड़ती है। यह जटिल स्थिति आज न केवल भारत, बल्कि इटली, कनाडा, कुछ स्कैन्डिनेवियायी और यूरोपीय देशों (इटली, बेल्जियम) जसे परिपक्व माने जाने वाले लोकतांत्रिक देशों में भी है, जबकि पहले वहां प्रमुख रूप से दो दल ही ताकतवर थे। इस व्यवस्थागत मजबूरी के साथ रहना हमें सीखना होगा। संकीर्ण स्वार्थ पूरा करने वाले छोटे दलों को जनता ही सबक सिखा सकती है।

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  • Web Title: चाोड़-तोड़ का दौर