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पर्यावरण को बचाएंगे बहुमंजिले खेत

ृषि ने हमारी दुनिया की तस्वीर को काफी बदला है। इस कोशिश में वर्षा वाले जंगल भी कटे हैं और उष्ण कटिबंधीय जंगल भी। इनकी जगह ले ली है गेहूं, मकई और खाद्य पदार्थो की दूसरी लहलहाती फसलों ने। यह तस्वीर बदली है दुनिया की बढ़ती जरूरतों को पूरा करने के लिए। अनुमान है कि दुनिया में इस समय जितनी जमीन पर खेती हो रही है, वह पूर दक्षिण अमेरिका के बराबर है। इसमें चारागाह और चारा उगाने वाले खेत भी शामिल हैं। खेती के जो फायदे हैं, उनसे इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन उसके लिए हमने जिस तरह से अपनी दुनिया को बदला है, उसने कई तरह से नुकसान भी पहुंचाया है। हालांकि ऐसा हमारा इरादा नहीं था। इससे हमारे ईकोसिस्टम और उसकी भूमिका को काफी नुकसान पहुंचा। इसी के चलते पर्यावरण परिवर्तन भी काफी तेज हुआ। हमारी धरती फिलहाल अपने गरम दौर से गुजर रही है। हम कृषि और फॉसिल्स ईंधन के इस्तेमाल पर काफी निर्भर हैं। अमेरिका में तो फॉसिल्स ईंधन का पांचवां ंहिस्सा फसलों में ही इस्तेमाल होता है। इसके चलते पिछले बीस साल में पर्यावरण काफी तेजी से बदल रहा है। इसका एक बड़ा कारण वातावरण में बढ़ रही ग्रीन हाउस गैसें खासकर कार्बन डाईआक्साइड है। जसे-ौसे आबादी बढ़ती है तो लोगों को बसाने और उनके लिए अनाज उपजाने का एक अच्छा तरीका जंगल को उााड़ना ही हो गया है। कार्बन डाई ऑक्साइड का उत्पादन लगातार बढ़ रहा है और उन्हें पचाने वाले पेड़ कम हो रहे हैं, इसलिए यह गैस वातावरण में ही रह जाती है और सूरा की रोशनी को रोकती है। जिसे हम पर्यावरण परिवर्तन कहते हैं, वह दरअसल खाद्य पदार्थो की लगातार आपूर्ति बनाए रखने की हमारी कोशिशों का ही नतीजा है। यह ऐसा परिवर्तन है जो मानव जाति की दीर्घायु होने की संभावनाओं पर भी प्रश्न चिह्न् लगा रहा है। क्या इस चक्र को धीमा करने या उल्टा चलाने के लिए कुछ किया जा सकता है? जंगलों को अगर एक बार फिर हरा-भरा होने का मौका दिया जाए तो इस परिवर्तन को रोका भी जा सकता है। एफएओ यानी खाद्य व कृषि संगठन ने इस बात का अनुमान लगाने की कोशिश की है कि फिलहाल जो कार्बन डाईआक्साइड उत्सर्जन है, उसके लिए कितनी तादाद में जंगलों की जरूरत पड़ेगी। संगठन का कहना है कि इस साधारण और प्रभावी तरीके को फिलहाल हम नहीं अपना सकते तो उसकी वजह सिर्फ यह है कि खेती का क्या होगा। अल गोर और वंगरी मट्ठाई जसे नोबेल पुरस्कार विजेता भी इससे सहमत हैं। अगर हम विश्व स्तर पर बनी हुई इमारतों में वर्टिकल खेती करें तो हम अपने जंगलों को पुरानी स्थिति में पहुंचाने की कोशिश कर सकते हैं। इससे हमें कार्बन डाईआक्साइड को कम करने का कुदरती तरीका मिल जाएगा और हम पर्यावरण परिवर्तन पर भी ब्रेक लगा सकेंगे। ऊंची इमारतों में खेती करना न सिर्फ मुमकिन है बल्कि इसके कई फायदे भी हैं। इसके आलोचकों का कहना है कि पेड़ों को उगाना और जंगल बसाना एक धीमा सिलसिला है। बीज से बड़ा पेड़ बनने में बीस साल तक का समय लग जाता है। फिर इसे प्रभावी बनाने के लिए उन सभी राष्ट्रों के तालमेल की जरूरत होगी जहां भारी पैमाने पर जंगल काटे गए हैं। अगर यह बात सही भी है तो भी कुछ न करने का अर्थ तो हार मान लेना ही है। मान लीजिए कि हम पर्यावरण परिवर्तन का चक्र उल्टा चलाने के लिए कुछ करं ही न। तो उसके बाद भी हमें खाद्यान्न पैदा करने का कोई और तरीका तो ढूंढ़ना ही होगा वर्ना इंसान का नाम भी उन जानवरों की फेहरिस्त में जुड़ जाएगा जो विकास यात्रा में लुप्त हो गए। अगर हम कुछ नहीं करते तो भी आगे चलकर बहुमंजिली इमारतों में खेती करना ही एकमात्र प्रभावी विकल्प रह जाएगा। ऐसी दुनिया में जहां कोई भी जमीन खेती के लायक नहीं बचेगी, पर्यावरण के बदलाव इस धरती पर कहीं भी फसल उगाने को नामुमकिन बना देंगे। वहां फिर और कौन-सा तरीका बच जाएगा? अगर हम मौजूदा अत्याधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करं तो बहुमंजिली इमारतों में खेती कर सकते हैं। यह मौजूदा तरीकों के मुकाबले कई तरह से फायदेमंद भी रहेगा। इससे एक के ऊपर एक कई स्तरों पर खेती होगी जो बहुत सार खेतों को मुक्त कर देगी। मसलन एक एकड़ में बनी इमारत के अंदर इतनी स्ट्राबेरी पैदा हो सकती हैं जितनी तीस एकड़ खेतों में। इसके अलावा फायदे यह होंगे कि मौसम खराब होने पर फसल से हाथ धोने का खतरा खत्म हो जाएगा। दूसर इससे फॉसिल्स ईंधन का इस्तेमाल काफी तेजी से घटेगा। किसी तरह की बरबादी नहीं होगी क्योंकि सार पानी की रीसाइक्िलंग हो जाएगी। बाकी बची हुई कृषि भूमि को जंगल आबाद करने और पर्यावरण को हुए नुकसान की भरपाई करने के लिए छोड़ दिया जाएगा। हमारे पास नियंत्रित वातावरण में फसल उगाने की बहुत सारी तकनीक उपलब्ध हैं। हाइड्रोपोनिक्स, ऐरोपोनिक्स, ड्रिप इरीगेशन ऐसे ढेर सार तरीके हमार पास आज भी मौजूद हैं, जिन्हें हम भारी तादाद में उत्पादन के लिए आज भी इस्तेमाल कर सकते हैं। ये सभी फसलें विशेष कार्बनिक परिस्थितियों में उगाई जाएंगी। इसके लिए वे रसायन इस्तेमाल किए जाएंगे जो उस फसल के हिसाब से मुफीद हैं। इस तरह की इमारतों के भीतर होने वाली खेती का एक महत्वपूर्ण बाईप्रोडक्ट होगा पीने का शुद्ध पानी। यह पौधों के वाष्पन से बनेगा। एक और चीज होगी वह ऊरा जो पौधों के ऐसे हिस्सों की रिसाइक्िलंग से तैयार होगी जो खाने के लायक नहीं हैं। और फिर जिन शहरों में बहुमंजिली इमारतों वाले ये खेत होंगे, उन्हें अपना राशन पानी इन्हीं खेतों से मिल जाया करगा। यानी इस मामले में वे पूरी तरह से आत्मनिर्भर होंगे। उम्मीद यही है कि खाद्य संप्रभुता की इस राह पर जो सबसे पहले चलेगा, उसे बढ़त के साथ ही कई तरह के आर्थिक फायदे मिलेंगे। लेखक कोलंबिया विश्वविद्यालय के मेलमैन स्कूल ऑफ पब्लिक हैल्थ में पर्यावरण स्वास्थ्य विज्ञान के प्रोफेसर हैं।ं

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