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बस्तर : कौन भगा रहा है व्यापारियों को

बस्तर के व्यापारी बोरिया-बिस्तर बांधकर बाहर जाने को बेकरार हैं। वे व्यापारी पीढ़ियों से बस्तर में बसे हुए हैं। इनके पूर्वज यहां तब आए थे, जब बस्तर का नाम तक किसी ने नहीं सुना होगा। ऐसे ही परिवार के शिवेंद्र को डर है कि कहीं रातों-रात घर-बार और प्रॉपर्टी छोड़कर भागने की नौबत न आ जाए। डर नक्सलियों से नहीं है। वे कहते हैं बस्तर में नक्सल कोई आज से है ? जमाना हो गया। यह इलाका तो छठे दशक से नक्सलबाड़ी जसा है। नक्सलियों ने व्यापारियों को कब सताया? पर यह बार-बार का अंधेरा और पानी की कमी बरदाश्त नहीं होती। शिवेंद्र का परिवार बस्तर में 78 बरस से है। उनके दादा गोवर्धन भाई यहां आदिवासियों से हर्रा, बहेड़ा और झाड़ू खरीदकर बाहर भेजते थे। प्रवीण का परिवार भी करीब अस्सी साल से बस्तर में है। पर उन्होंने भी अपने परिवार के एक सदस्य को व्यापार जमाने बड़ोदरा भेज दिया है। बस्तर के ज्यादातर व्यापारी परिवारों में अब ऐसी ही सुगबुगाहट है। बस्तर कोई छोड़ना नहीं चाहता, क्योंकि पीढ़ियों से रहते हुए अब तो सभी बस्तरिया हो गए हैं, पर सलवाजुडूम के बाद सरकार और नक्सलियों के बीच जो टकराव के हालात बने हैं, उसमें सभी अपने-आपको असुरक्षित महसूस करने लगे हैं। बस्तर में करीब दो सौ वर्ष पहले व्यापार जसी अवधारणा नहीं थी। पहले लोग आदिवासियों को उनकी जरुरत का कोई भी सामान देकर बदले में साग-भाजी और अनाज ले लिया करते थे। वस्तु विनिमय होता था। धीर-धीर जब यहाँ सामान और दुकानों की जरूरत महसूस हुई तो यहां बाहरी लोगों को लाकर बसाने का सिलसिला शुरू हुआ। तत्कालीन काकतीय शासकों ने सबसे पहले उड़िया ब्राह्मण परिवारों को यहां बसाया, फिर परदेसी ब्राह्मण यानी उत्तरप्रदेश से कान्यकुब्ज ब्राह्मण आए। इनके आने के साथ ही दुकानों की जरूरत महसूस हुई और कुछ राजस्थानियों को लाकर बसाया गया। गुजराती परिवार यहां आर.आर. टाटा कं पनी के मुलाजिम बनकर आए थे । यह कंपनी वनोपज का व्यापार करती थी। कं पनी जंगल का ठेका लेकर वहां से हर्रा-बहेड़ा, गोंद, झाड़ू, चिरौंजी, लाख वगैरह इकट्ठा कराकर बाहर भेजती थी। यहाँ के र्हे की तब कपड़ा मिलों और चमड़ा उद्योग में खासी मांग थी। गुजराती फितरतन उद्यमी होते हैं। बाद में वनोपज के इस धंधे की कमान उन्होंने संभाल ली। निखिल सांघवी ऐसे ही एक परिवार से हैं। उन्हें कभी अपने गुजराती होने का अहसास ही नहीं था, पर अब वे भी बस्तर छोड़ना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि रायपुर क्या छत्तीसगढ़ की कोई भी जगह उनके लिए महफूा नहीं है। उन्हें आशंका है कि कल को यदि छत्तीसगढ़िया का सवाल उठा तो वे तो कहीं के न रहेंगे। सभी व्यापारी मौजूदा माहौल से घबराए हुए हैं। व्यापारियों की दलील है कि बस्तर में नक्सलियों का प्रभाव क्या कोई हाल की बात है। नक्सलियों को यहां पैठ बनाए चार दशक हो गए हैं। नक्सलियों ने कभी व्यापारिक गतिविधियों में कोई खलल नहीं डाला। तेंदूपत्ता व्यापार की तो पूरी डील यही नक्सली करते हैं। नक्सलियों के गढ़ दक्षिण बस्तर में कभी किसी व्यापारी के प्रताड़न की कोई बड़ी घटना देखने में नहीं आई। वह इतना जरूर कहते हैं कि सरकार और नक्सल संघर्ष में वे पिसे जा रहे हैं। उनका इशारा सलवाजुडूम की ओर है। आदिवासी कल्याण के नाम पर शुरू हुए इस अभियान से व्यापारियों के सिर पर तलवार लटक रही है। बस्तर में पिछले एक साल में दो बार बिजली-पानी ठप हो चुका है। खबरों में अचानक पैदा हुए इस संकट की वजह घने जंगलों में स्थित बिजली के टावरों में विस्फोट बताया गया था। जाहिर है कि सरकार और मीडिया का इशारा नक्सलियों की ओर था। ये टावर ऐसे बीहड़ इलाकों में थे कि वहां तक पहुंचकर खम्भे सुधारने में बिजली विभाग की टीम को खासा वक्त लग गया। लिहाजा पिछली बार पूरा बस्तर संभाग 15 दिन और अब की बार 2 सेोून तक सात दिनों तक अंधेर में डूबा रहा। इसका असर पानी की सप्लाई लाइन पर भी पड़ा और शहरों में त्राहि-त्राहि मच गई। बस्तर में जब भी कोई वारदात होती है, सरकार पर भी उंगली उठती है लिहाजा इस बार भी ऐसा हुआ। क्या नक्सलियों से मोहभंग कराने के लिए सरकारी पक्ष ऐसा कर सकता है? इसकी असलियत तो सरकार और नक्सली जानें, पर चिंता यह है कि बस्तर से व्यापारी पलायन कर गए तो वहां की अर्थव्यवस्था का क्या होगा? वनोपज और कच्चे माल या खनिज का दोहन आदिवास्यिों के बस की बात नहीं है। वह तो जंगल में अपने माहौल के साथ मस्त है। उसे तो अपने जरूरत की चीजें अपने इर्द-गिर्द मिल रही हैं। लेखिका हिन्दुस्तान से जुड़ी हैं।

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