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मंगल मिशन के बाद इसरो की नजरें सूर्य पर

मंगल मिशन के बाद भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की नजर अब सूरज पर है। इसरो तीन और महत्वपूर्ण मिशनों पर कार्य तेज करने जा रहा है। इनमें पहला कदम है अंतरिक्ष में मानव मिशन भेजना। दूसरा मिशन...

मंगल मिशन के बाद इसरो की नजरें सूर्य पर
लाइव हिन्दुस्तान टीमTue, 05 Nov 2013 11:15 PM

मंगल मिशन के बाद भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की नजर अब सूरज पर है। इसरो तीन और महत्वपूर्ण मिशनों पर कार्य तेज करने जा रहा है। इनमें पहला कदम है अंतरिक्ष में मानव मिशन भेजना। दूसरा मिशन चंद्रमा की सतह पर एक रोवर उतारना और तीसरा मिशन सूर्य के अध्ययन के लिए आदित्य उपग्रह का प्रक्षेपण करना है। इन तीनों महत्वपूर्ण मिशनों को अगले चार सालों के भीतर अंजाम दिया जाएगा।

पृथ्वी की कक्षा में सफलतापूर्वक मंगलयान के पहुंचने के बाद इसरो के वैज्ञानिक अभियान की सफलता को लेकर काफी आश्वस्त हैं। हालांकि जब तक यह उपग्रह मंगल की कक्षा में स्थापित नहीं हो जाता तब तक वैज्ञानिक इस मिशन से जूझते रहेंगे। लेकिन इसरो की रणनीति के तहत मिशन की सलफता या विफलता का आगामी कार्यक्रमों पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। तय मिशनों को निर्धारित समयावधि में अंजाम दिया जाएगा।

इसरो ने 2015 में अंतरिक्ष में मानव मिशन भेजने के लिए आरंभिक तैयारियां पूरी कर दी हैं। इसके लिए वैज्ञानिक अध्ययन का कार्य करीब-करीब पूरा कर लिया गया है। कुछ आवश्यक मंजूरियां मिलने के बाद अंतरिक्ष यान के निर्माण की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। अंतरिक्ष में जाने वाली इसरो की पहली मानव फ्लाईट में दो यात्री होंगे। यह फ्लाईट अंतरिक्ष में सौ से नौ सौ किलोमीटर ऊपर तक जाएगी।

इसी प्रकार चंद्रयान-2 एवं आदित्य मिशन को अंतरिक्ष कार्यक्रम की सलाहकार समिति पहले ही अपनी स्वीकृति प्रदान कर चुकी है। चंद्रयान-2 मिशन में एक रोवर (रोबोटिक उपकरण) को चांद की सतह पर उतारना है। जबकि आदित्य उपग्रह को सूर्य की कक्षा में भेजा जाना है। जो सूर्य के बारे में अध्ययन करेगा। ये दोनों इसरो के भावी बड़े मिशन हैं। जाने-माने वैज्ञानिक प्रोफेसर यशपाल के अनुसार इसरो एक-एक कदम बढ़ाकर अपनी क्षमता में विकास कर रहा है। इसलिए एक सफलता के बाद दूसरे बड़े लक्ष्य के दरवाजे खुल रहे हैं।

नौ महानायकों की अथक मेहनत रंग लाई
के. राधाकृष्णन (इसरो प्रमुख): मॉर्स ऑर्बिटर मिशन का पूरा जिम्मा इनके ही ऊपर था। राधाकृष्णन भारतीय अंतरिक्ष विज्ञानी एवं तकनीकी संस्थान के मैनेजमेंट बोर्ड के चेयरमैन भी हैं। इनका जन्म केरल के त्रिशूर में 29 अगस्त 1949 को हुआ था। राधाकृष्णन इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग और अंतरिक्ष शोध के साथ कर्नाटक संगीत और कथकली में भी पारंगत हैं। 
एस. रामाकृष्णन (विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र के निदेशक): इनके ऊपर रॉकेट (पोलर सैटेलाइट लांच व्हीकल) के छोड़ने की जिम्मेदारी थी।
एम. अन्नादुराई (मार्स ऑर्बिटर मिशन के कार्यक्रम निदेशक): इनके ऊपर बजट प्रबंधन, कार्यक्रम प्रबंधन आदि की जिम्मेदारी थी।
एएस किरण कुमार (सैटेलाइट एप्लीकेशन सेंटर के निदेशक): मार्स ऑर्बिटर के साथ गए कलर कैमरा, मीथेन सेंसर और स्पेक्ट्रोमीटर को बनाने की जिम्मेदारी थी।
एमवाईएस प्रसाद (चेयरमैन, सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र): रेंज सुरक्षा की जिम्मेदारी के साथ इनके प्रसाद रॉकेट पोर्ट के इंचार्ज थे।
एसके शिवकुमार (आईएसआरओ सैटेलाइट सेंटर के निदेशक): इनके ऊपर सैटेलाइट तकनीक विकसित करने की जिम्मेदारी थी।
पी. कुंहीकृष्णन (पीएसएलवी प्रोग्राम, प्रोजेक्ट निदेशक): सैटेलाइट को कक्षा में सही तरह से स्थापित करने की जिम्मेदारी इनके ऊपर थी। एस. अरुनान (मार्स ऑर्बिटर मिशन, प्रोजेक्ट निदेशक): अंतरिक्ष यान बनाने वाली टीम का नेतृत्व अरुनान ही कर रहे थे।
बी. जयकुमार (पीएसएलवी प्रोजेक्ट के सह प्रोजेक्ट निदेशक): इनके ऊपर रॉकेट सिस्टम की अंतिम समय तक जांच की जिम्मेदारी थी।
एमएस पैन्नीर्सेल्वाम (श्रीहरिकोटा रॉकेट पोर्ट के रेंज ऑपरेशन डायरेक्टर): लांच के कार्यक्रम को लागू करवाना इनकी जिम्मेदारी थी।  1000 के लगभग विज्ञानी इस मिशन में लगे हुए थे।

वर्ष 2000 के बाद सफलता की रफ्तार बढ़ी
अब तक 51 बार मंगल ग्रह पर अंतरिक्ष यान भेजने की कोशिश हो चुकी है, जिसमें से सिर्फ 21 बार ही सफलता हासिल हुई है। मंगल मिशन पर गए यान अधिकतर ग्रह पर पहुंचते समय विफल हुए हैं। वर्ष 2000 के बाद सफलता की दर बढ़ी है। वर्ष 1971 से पहले जितने भी मंगल अभियान विफल हुए, उनमें से ज्यादातर लांचिंग के दौरान ही नष्ट हो गए। वर्ष 1973 में सोवियत संघ ने दो मंगल मिशन मार्स-4 और मार्स-7 लेंडर लांच किए गए। ये दोनों ही यान मंगल ग्रह से आगे निकल गए। अमेरिका के 1992 में लांचमार्स ऑब्जर्वर, 1998 के मार्स क्लाइमेंट ऑर्बिटर, 1999 मार्स पोलर लेंडर व डीप स्पेस 2 प्रोबस और यूरोप का वर्ष 2003 में लांच मार्स एक्सप्रेस ऑर्बिटर मंगल पर पहुंचते समय विफल हुए। सबसे बड़ी बात यह है कि वर्ष 2000 के बाद मंगल पर 12 अभियान भेजे गए और इनमें से सिर्फ दो ही विफल रहे। यानी वर्ष 2000 के बाद मंगल अभियानों की विफलता में तेजी से कमी दर्ज की गई।

मंगलयान में हुआ विशेष तकनीक का उपयोग
- सेंसर के जरिये मंगल ग्रह पर मीथेन की खोज की जाएगी। इससे मंगल पर जीवन के संकेत मिल सकते हैं।
- मंगलयान को इस तरह से विकसित किया गया है कि कुछ खराबी होने पर यह खुद ही अपनी मरम्मत कर लेगा। - सूर्य से यह यान ऊर्जा हासिल करेगा।

इसरो प्रमुख ने की पूजा
लांच से पहले इसरो प्रमुख के. राधाकृष्णन ने मंगलयान की प्रतिकृति के साथ तिरुपति वेंकटेश्वर मंदिर में अभियान की सफलता के लिए पूजा की। पूर्व में भी इसरो प्रमुख ऐसा कर चुके हैं।

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