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पांवों पर खड़ा होना भी आसान नहीं उनके लिए

महाराष्ट्र के औरंगाबाद नगर में महिलाओं के एक संगठन ने दुर्घटना में मारे गए लोगों के शवों का अंतिम संस्कार करने का चुनौतीपूर्ण काम अपने हाथ में लिया है। ये महिलाएं स्वयं सहायता समूह की सदस्य हैं। परम्परागत रूप से ये महिलाएं पैसा कमाने के लिए पापड़ बनाने, कढ़ाई करने, कागज की चीजें बनाने आदि के काम करती हैं। इस संगठन द्वारा परम्परा को तोड़ने का यह अनोखा मामला है। समाचारपत्र की रिपोर्ट के अनुसार, औरंगाबाद नगर निगम ने इस काम के लिए ठेका आमंत्रित किया था, जिसे हासिल करने में औरंगाबाद की ये महिलाएं सफल रहीं। पुरुषों के चार संगठनों ने भी इस ठेके के लिए आवेदन किया था और इस बात पर जोर दिया था कि यह काम महिलाओं का नहीं है। फिर भी पंचशील महिला बचत गात की 11 महिलाओं ने यह ठेका हासिल कर लिया। औरंगाबाद नगर निगम पांच शवों के अंतिम संस्कार के लिए इस संगठन को 15,000 रुपए महीना देता है। प्रत्येक अतिरिक्त शव के लिए 3,000 रुपए दिए जाते हैं। महिलाओं का कहना है कि वे प्रत्येक शव के दाह संस्कार के बाद 500 रुपया बचा लेंगी। आश्चर्य की बात है कि इन महिलाओं पर शवों के अंतिम संस्कार के काम के प्रति वितृष्णा का कोई प्रभाव नहीं पड़ा और न ही अपने परिवार या समाज के रवैये की उन्होंने परवाह की। उनका विश्वास है कि दुर्घटना के शिकार या लावारिस शवों का अंतिम संस्कार सम्मानपूर्वक किया जाना चाहिए। यह कहानी इसलिए भी दिलचस्प है क्योंकि इससे यह सवाल भी जुड़ा है कि महिलाओं को कैसे कार्य करने चाहिए और कैसे नहीं। वैसे शिक्षित महिलाएं नए-नए काम अपनाकर परम्परागत अवधारणा को तोड़ रही हैं, किन्तु गरीब महिलाएं अभी भी पुरानी लकीर पीटने को बाध्य हैं। वे जो काम करती हैं उसका उन्हें कोई वेतन नहीं मिलता। ग्रामीण क्षेत्र, विशेषकर कृषि कार्यो में जुटी औरतों की स्थिति तो जस की तस है। शहरों की गरीब महिलाएं भी घरेलू सहायता या घरों से किए जाने वाले कार्यो से जुड़ी हैं। मध्य वर्ग, विशेषकर शहरों की शिक्षित युवतियां स्थायी कार्य की खोज में रहती हैं लेकिन उन्हें अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। कुछ परेशानियां तो अनापेक्षित होती है। महाराष्ट्र के एक किस्से से ऐसी अनापेक्षित कठिनाइयों का सहज अनुमान लगाया जा सकता है। समाचारपत्रों में हाल ही में प्रकाशित एक खबर के अनुसार, सहायक मोटर वाहन निरीक्षक के पद पर नियुक्ित के निर्णय को छह महिलाओं ने मुंबई उच्च न्यायालय में चुनौती दी। इस पद की 207 रिक्ितयों में से महिलाओं के लिए 62 आरक्षित थीं, लेकिन अड़ंगा फंसा दिया गया। महिलाओं की नियुक्ित के लिए आवश्यक लंबाई 157 सेंटीमीटर तय कर दी गई। विभाग के अनुसार क्योंकि पद पर नियुक्त व्यक्ित को ट्रकों और भारी वाहनों का टेस्ट लेना था, इसलिए लंबाई कम से कम 157 सेंटीमीटर होनी जरूरी थी। कम लंबाई वाले अयार्थी के लिए टेस्ट ड्राइव करना कठिन होगा। इस आदेश को अदालत में चुनौती देने वाली महिलाओं का तर्क था कि लंबाई संबंधी शर्त अनुचित है। वे पद के लिए जरूरी शर्ते पूरी करती हैं, इसलिए उन्हें नियुक्त किया जाना चाहिए। दुर्भाग्यवश मुंबई उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि नियोक्ता को पद के लिए शर्त तय करने का अधिकार है। इस सारे मामले में महत्वपूर्ण बात यह है कि महिलाओं ने सहायक मोटर वाहन निरीक्षक जसे पद के लिए आवेदन किया। आज बेंगलुरु शहर में महिलाएं डाक वितरण का कार्य कर रही हैं। अन्य नगरों में वे यह कार्य बरसों से कर रही हैं। यह अच्छी पहल है और इससे महिलाओं के लिए रोजगार के नए अवसर खुलते हैं। मुंबई में महिलाएं टैक्सी चालक का काम करती हैं जबकि कुछ अन्य नगरों में वे आटो चालक का काम करती हैं। दुर्भाग्यवश मुंबई में उन्हें बतौर बस कंडक्टर रखने का परीक्षण लंबे समय तक नहीं चल पाया, किन्तु मुझे बताया गया है कि कई शहरों में वे इस जिम्मेदारी का निर्वाह सफलतापूर्वक कर रही हैं। देश में अधिकांश महिलाएं असंगठित क्षेत्र अथवा अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत हैं। इसका अर्थ यही हुआ कि न तो उन्हें काम की सुरक्षा प्राप्त है, न उचित वेतन सुनिश्चित है और न कोई इस बात की निगरानी करता है कि वे कैसी परिस्थितियों में कार्य करती हैं। भले ही महिलाओं को उनके काम के बदले कुछ भी पैसा न मिलता हो, कम पैसा मिलता हो या पूरा मिलता हो, उनके विकल्प सीमित होते हैं। गरीब और अशिक्षित औरतों के सामने तो यह कठिनाई और बड़ी है। अमेरिका में हाल में हुए एक सव्रेक्षण से चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। इस सव्रे से पता चला कि एक-तिहाई महिलाएं मौजूद 500 पेशों में से केवल 10 में काम करती हैं। जिन पेशों से वहां यादातर महिलाएं जुड़ी हैं, वे हैं शिक्षा, नर्सिग और बुक कीपिंग। जीवन लागत बढ़ने के साथ-साथ गरीब और मध्य वर्ग की यादा से यादा औरतों को नौकरी करनी पड़ेगी। उनके नौकरी करने का सकारात्मक प्रभाव अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। इकोनोमिस्ट पत्रिका के 12 जनवरी, 2006 के अंक के अनुसार, पिछले कुछ दशक में यादा से यादा महिलाओं के रोजगार करने से विकास को बल मिला है। विश्व अर्थव्यवस्था के विकास में नई तकनीक या भारत व चीन जसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं में यादा योगदान महिलाओं का रहा है। यदि घरेलू काम में उनके योगदान अथवा बच्चों को बड़ा करने में की जाने वाली मेहनत को भी जोड़ दिया जाए तो दुनिया के उत्पादन का आधे से अधिक हिस्सा महिलाओं के खाते में लिखा जाएगा। लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं अर्थव्यवस्था में महिलाओं के योगदान को सदैव कम करके आंका जाता है। इस देश में अभी भी ऐसे अनेक लोग हैं जो यह मानते हैं कि औरतों को केवल औरतों वाले काम करने चाहिए। नौकरी के लिए घर से बाहर उन्हें तभी निकलना चाहिए जब बहुत जरूरी हो, लेकिन अमीर वर्ग को छोड़कर समाज के शेष सभी वर्गो की महिलाओं के लिए काम करना जरूरी होता जा रहा है। अर्थव्यवस्था के बदलते स्वरूप और जिंदा रहने की ख्वाइश के कारण अब काम करना जरूरी है। औरंगाबाद की औरतों, डाक वितरण में जुटी महिलाओं, बुंदेलखंड में अपना अखबार निकालने वाली या उन जसी अनेक औरतों ने सोच बदल दी है। उनकी माएं जो काम करने के बारे में कभी सोच नहीं सकती थीं या पिता मान नहीं सकते थे कि बेटी यह कर पाएगी, आज वे वैसे सारे काम कर रही हैं।ंं

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