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आत्मनियंत्रण

चार जन्मजात प्रवृत्तियाँ हैं। आहार, निद्रा, भय और मैथुन। हर किसी के शरीर में छोटा या बड़ा पेट है। सबको भूख लगती है। पेट के लिए ही इस चराचर संसार में जीवमात्र विचरण करते हैं। मनुष्य अन्य प्राणियों से अधिक बुद्धि रखता है, इसलिए उसने भविष्य के लिए संग्रह करना भी सीख लिया। उसने अपना पेट और आवश्यकताएं भी बढ़ा लीं। अन्य जीव संग्रह नहीं करते। वे पेट भरने के लिए उद्यम अवश्य करते हैं। उसी प्रकार निद्रा भी है। सब सोते हैं। नींद से जगकर फिर तरोताजा होते हैं। सभी जीवों में तीसरी प्रवृत्ति भय है। सभी में सुरक्षा का भाव होता है। मनुष्य को अंधकार और अकेलेपन से भी भय लगता है। कई लोग तो भीड़ में भी भय खाते हैं। चौथी प्राकृतिक आवश्यकता मैथुन है। सृजन के लिए दो प्राणियों (मादा और नर) का मिलना उसी प्रकार आवश्यक है जैसे द्विदल वाले अन्न (दलहन) के दोनों दल एक आवरण के भीतर छुपे रहकर ही अंकुरित होते हैं। यदि मूंग, चना जैसे अन्न के दोनों दल अलग-अलग कर दिए जाएं तो वे अंकुरित नहीं होंगे। और वे एक ही बार अंकुरित होते हैं। प्रकृति ने मनुष्य से इतर जीवों में आत्मनियंत्रण के लिए गुंजाइश नहीं छोड़ी। उन्हें इसकी जरूरत भी नहीं। एक निश्चित समय पर उन्हें भूख लगती है, नींद आती है, निश्चित परिस्थितियों में ही वे भय खाते हैं। हर जीव के मैथुन संगम के लिए विशेष मौसम निर्धारित है। निश्चित जलवायु और मौसम में ही निश्चित फसल, फल और सब्जियाँ लगती हैं। वे सिर्फ संतान पैदा करने के लिए ही मिलते हैं। मनुष्य ही अकेला है जिसकी चारों प्रवृत्तियाँ बढ़ती जाती हैं। उसकी भूख, नींद, भय और मैथुन पर प्रकृति नियंत्रण नहीं रखती, पर वह इन पर नियंत्रण का सामथ्र्य रखता है। इसे ही आत्मनियंत्रण कहते हैं। कितना खाएं, कितना सोएं, किससे भयभीत हों और मैथुन भाव का कितना इस्तेमाल करें, मनुष्य अपने आत्मबल से नियंत्रण कर सकता है।

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  • Web Title: आत्मनियंत्रण