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कटौती की गाज गिरगी योजनाओं पर

बेहिसाब महंगाई और आसमान छूते तेल मूल्यों के चलते बढ़ते जा रहे सब्सिडी बोझ ने सरकार को विभिन्न योजनाओं के वित्त पोषण में कटौती के लिए मजबूर कर दिया है। प्रधानमंत्री कार्यालय के निर्देश पर विदेश यात्राओं और प्रशासनिक खर्चो के बाद अब बारी विभिन्न योजनाओं के खर्चे में कटौती की है। मंत्रालयों के सूत्रों के मुताबिक नॉर्थ ब्लॉक विभिन्न योजनाओं के लिए आवंटित खर्च में 10 से 20 फीसदी तक की कटौती कर सकता है। जाहिर है इसका दुष्प्रभाव देश की तमाम विकास गतिविधियों पर पड़ेगा। सूत्रों के मुताबिक ऐसा कदम उठाये जाने से खासतौर पर उन योजनाओं के कार्यान्वयन पर असर पड़ेगा जो सामान्य तया धीमी गति से संचालित होती हैं। इसके तहत रनफेड एरिया से संबंधित स्कीमें और अन्य कृषि परियोजनायें हैं। इसके साथ ही इससे विशेष रूप से पहाड़ी क्षेत्रों में संचालित होने वाली परियोजनाओं के कार्यान्वयन पर दुष्प्रभाव पड़ सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि अगले कुछ महीनों बाद ही सर्दियां शुरू होने पर बर्फ जमा होनी शुरू हो जाती है और परिणामस्वरूप वहां सार विकासात्मक काम ठप करने पड़ जाते हैं, उदाहरण के तौर पर सड़क निर्माण जसे काम। उच्च पदस्थ सूत्रों के मुताबिक फिलहाल नये प्रस्ताव बनाने का काम ठप कर दिया गया है। मोटे तौर पर वित्त मंत्रालय की ओर से संकेत यही है कि आयोजना यानी प्लान और गैर-आयोजना यानी नॉन-प्लान बजट में क्रमिक रूप से लगभग दस-दस फीसदी की कटौती कर दी जाए। इससे लाखों करोड़ रुपये की बजत संभव हो सकती है। इसके लिए स्कीमों की पहचान की जा सकती है। चालू वित्त वर्ष के आम बजट में आयोजना व्यय 2,43,386 करोड़ रुपये रखा गया है जबकि गैर-आयोजना व्यय राशि 5,07,4रोड़ रुपये है। ध्यान रहे कि इनमें बहुत से ऐसे खर्च भी शामिल हैं जिनमें सरकार चाहकर भी कटौती कर पाने की स्थिति में नहीं होगी जो सरकार की नीतिगत देनदारियों के दायर में आते हैं। दरअसल सरकार को यह कदम इसलिए उठाने के लिए विवश होना पड़ रहा है क्योंकि उस पर सब्सिडी बोझ अप्रत्याशित रूप से लगातार बढ़ता जा रहा है। जहां एक ओर उर्वरक सब्सिडी बिल एक लाख करोड़ को पार कर गया है, वहीं दूसरी ओर पेट्रो सब्सिडी बिल भी लगभग ढाई लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया है। महंगाई पर लगाम लगाने के लिए सरकार ने सस्ते आयात का रास्ता खोला है जिससे सीमा शुल्क संग्रह का प्रभावित होना तय है।ं

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