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फैसला अब भाग्यविधाता की अदालत में

संसदीय जनतंत्र में अल्पमत के बाद गद्दी पर बने रहना असंभव हो जाता है और इसीलिए तत्काल नये शक्ित समीकरण साधने अनिवार्य हो जाते हैं। कांग्रेस ने सपा यानी अमर और मुलायम सिंह को गले लगा लिया है और ऐसा जान पड़ता है कि शायद यह सरकार बच जायेगी। हम इस तफसील में नहीं जाना चाहते कि इस सौदे की कितनी बड़ी कीमत चुकाई गई है और इसके अंतत: क्या नतीजे होंगे। सिर्फ इतना नोट किया जाए कि जो भी कीमत चुकायी जा रही है, वह आम जनता के उधार खाते में ही दर्ज की जायेगी। मनमोहन सिंह तो पहले ही हाथ झाड़ कर इस अंदाज में खड़े हैं- ‘कर चले हम फिदा जाने तन साथियो, अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो’! अंकों से खेलने में माहिर इस अर्थशास्त्री का इस घड़ी मुद्रास्फीति के बेलगाम आंकड़ों से यादा लेना-देना नहीं बचा। उन्हें इतिहास में अपनी जगह की चिंता से यादा भारी जिम्मेदारी महसूस हो रही है, राष्ट्रहित की बात सिर्फ रस्म अदायगी के तौर पर की जा रही है, वह भी सिर्फ अमेरिका के साथ परमाणविक समझौते के संदर्भ में। लगता है कि उनका बाल हठ सरीखा आचरण सिर्फ इस अहसास से प्रेरित है कि अगले चुनावों के बाद प्रधानमंत्री पद वह सुशोभित नहीं करेंगे। कांग्रेस की पस्ती को देखते हुए किसी और कांग्रेसी नेता के लिए भी यह महत्वाकांक्षा बेवकूफी ही कही जा सकती है। रही बात सोनिया गांधी की तो उन्होंने अपने परिवार की राजनीति में सक्रियता की कीमत कई बार चुकाई है। प्रधानमंत्री पद त्यागने के बाद उन पर स्वार्थ साधने का आरोप लगाना कठिन है। हां यह सवाल जरूर उठाया जा सकता है कि भारतीय जनतंत्र के वंशवादी संस्करण के अतिरिक्त किसी और स्वरूप में उनकी कोई रुचि है या नहीं? विश्वासमत का जो भी नतीजा निकले, यह बात साफ हो चुकी है कि अब फैसला साथियों-सहयोगियों-समर्थकों के हाथ में नहीं बल्कि जनता की अदालत में पहुंच चुका है। देर-सवेर चुनाव होंगे और सभी पार्टियों के भाग्य का फैसला एक बार फिर होगा। सबसे बड़ी जरूरत जनता मतदाता और भाग्यविधाता के बीच बुनियादी फर्क को अच्छी तरह समझ लेने की और कभी भी नहीं भुलाने की है। जनता में सभी मतदाता नहीं हैं। न ही सभी मतदाता जनता का पर्याय समझे जा सकते हैं। बहुसंख्यक मतदाता धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्रीयता, व्यक्ितगत स्वार्थ और वर्ग चरित्र के अनुसार चुनाव के वक्त मतदान करते हैं। राष्ट्रहित की बात छोड़िये स्थानीय, तात्कालिक, सामूहिक साझे के हित और सरोकार भी हम लोगों को याद नहीं रहते। इसी का नतीजा है कि बार-बार संसद और विधानसभाएं त्रिशंकु गति को प्राप्त होते हैं और जोड़-तोड़ कर बहुमत हासिल कर सरकार बनाने की मजबूरी घनघोर भ्रष्टाचार और अनैतिक दुराचार को प्रोत्साहित करती है। अगर मनमोहन सरकार बची रही तो उनके मददगारों में फिलहाल अनेक ऐसे समर्थक होंगे जो जघन्य अपराधों के सजायाफ्ता कुख्यात चेहरे हैं। यह तर्क बिल्कुल लचर है कि जनता सब कुछ जानती है और अपने दोस्त-दुश्मन पहचानती है। जनता नाम का अमूर्त इंसान मतदान केंद्र तक नहीं पहुंचता। वहां जो हाड़-मांस के पुतले पहुंचते हैं, उनमें से अधिकांश ऐसे कमजोर और जरूरतमंद इंसान ही होते हैं, जिन्हें ललचाना, बहलाना, फुसलाना, डराना, धमकाना, ताकतवर तबके के लिए बहुत आसान होता है। चुनावों का आयोजन चाहे कितना भी निर्भय-निष्पक्ष क्यों न हो, नदी में रहकर मगर से बैर वाला मुहावरा शाश्वत सत्य बना रहता है। यह समझना आत्मघातक गलतफहमी है कि जनता या मतदाता ही भारत भाग्यविधाता है। वास्तव में भारत भाग्यविधाता हमारे राष्ट्रगान में संबोधित कोई अद्वितीय जनहितकारी अधिनायक नहीं बल्कि खुदगर्ज परजीवी कुनबापरस्त शासक वर्ग की छोटी-सी बिरादरी है। वैसे इस श्रेष्ठ वर्ग के लिए ‘छोटा सा’ विशेषण का प्रयोग जरा अटपटा लगता है क्योंकि लगभग सवा अरब अबादी वाले इस देश में 0़.2-3 प्रतिशत आंकने पर भी यह संख्या बहुत बड़ी नजर आती है। इसी बिरादरी में आला नौकरशाह शामिल हैं- कार्यरत से यादा मुंहलगे, दरबारी, अवकाश प्राप्त और अनेक ऐसे दलाल, जिन्हें आज पावर ब्रोकर और किंग मेकर कहा जाने लगा है। तलछट की तरह बिछे रहते हैं, तलवे सहलाने वाले मीडियाकर्मी और अन्य समजीवी जिन्हें मुगालता रहता है कि वही जनमत निर्माण करते हैं और भारत के भाग्य की दिशा-दशा तय करते हैं। इन बातों से इस वक्त मगज़मारी का सिर्फ एक सबब है। अकेले पड़ गये विद्वान प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी की आलाकमान ने यह ऐलान कर डाला है कि वक्त की सबसे बड़ी जरूरत पारदर्शिता की है। भारत की जनता को यह समझाना अब टाला नहीं जा सकता कि अमेरिका के साथ परमाणविक करार राष्ट्रहित में है। हमारी समझ में यह बात नहीं आ रही कि क्या पारदर्शिता सिर्फ इसी एक मुद्दे पर केद्रिंत रह सकती है? क्यों अर्थव्यवस्था में जानलेवा मंदी, कमरतोड़ महंगाई और मुद्रास्फीति के बारे में सरकारी नीतियों की नाकामयाबी का विश्लेषण भी निर्मम पारदर्शिता के साथ ही होना चाहिए। मनमोहन सिंह और उनके साथी कितनी देर बगले झांकने से बचे रह सकते हैं। पारदर्शिता की दुहाई देते ही निरीह और निरक्षर ही सही बौखलायी जनता यह सवाल भी उठायेगी कि भ्रष्टाचारी अफसरों और नेताओं को दंडित करने वाली कार्रवाई क्यों बारंबार ठंडे बस्ते में डाली जाती है और किस तरह इस वक्त यूपीए सरकार बहुमत हासिल करेगी। तिलस्म तोड़ अय्यारी वाले अंदाज में हमारे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार यह फरमा चुके हैं कि काबुल में भारतीय राजदूतावास पर आत्मघातक आतंकवादी हमले के लिए पाकिस्तानी गुप्तचर संस्था आई़एस़आई ही जिम्मेदार है जिसे मुंहतोड़ जवाब दिया जायेगा, उसी की शैली में। जाहिर है कि सामरिक मामलों में पारदर्शिता की मांग नहीं की जा सकती, पर यह तकाजा तो किया ही जा सकता है कि संवेदनशील मसलों पर मुंह खोलने वालों को अपनी जिम्मेदारी का अहसास होना चाहिए। नारायणन साहब की दिलेरी संभवत: इसीलिए बढ़ी है कि संसद में शक्ित-परीक्षण के लिए जरूरी समर्थक उन्हीं ने जुटाए हैं। अफवाहें ऐसी ही गर्म हैं। जो लोग पारदर्शिता का हल्ला मचा रहे हैं, उन्हें याद दिलाने की जरूरत है- ‘पर्दा ना उठाओ, पर्दा जो उठेगा तो भेद खुल जायेगा’! जहां तक मतदाता का सवाल है, उसके लिए यह समझ लेना बेहद जरूरी है कि यदि उसे वास्तव में भारत के भाग्यविधाता की भूमिका निभानी है तो उसे जनता से रिश्ता-नाता जोड़ना होगा, वर्तमान शासकों के कुटुम्ब-कबीले में शामिल होने के लालच को छोड़कर।ड्ढr लेखक जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्राध्यापक और अंतरराष्ट्रीय अध्ययन संकाय के अध्यक्ष हैं।

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