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ग्राहकों के प्रति बैंकों का रवैया उदासीन

यदि कोई उपभोक्ता बैंकिंग सर्विस से असंतुष्ट है तो भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा इस वर्ष अप्रैल में प्रकाशित की गई बैंकिंग ओम्बुड्समैन (लोकायुक्त) स्कीम की वार्षिक रिपोर्ट (2006-07) देखे। आरबीआई के आंकड़ों के मुताबिक ओम्बुड्समैन की रिपोर्ट के आने से पहले पिछले 5 सालों में बैंकों के विरुद्ध की गई ग्राहकों की शिकायतों में 700 प्रतिशत का उछाल आया। 2002-03 में आरबीआई को इस संबंध में 5,3शिकायतें मिलीं जो 2004-05 में लगभग दोगुनी होकर 10,560 पर पहुंच गईं। 2005-06 में इनकी संख्या 31,732 और इसके बाद के वर्षो में 38,638 हो गई। शिकायतों की ये बढ़ती संख्या खराब बैंकिंग सेवाओं से यादा, शिकायत निवारण के लिए एक प्रभावशाली और विश्वसनीय सिस्टम की जरूरत की ओर इशारा करती हैं। यह आंकड़े ग्राहकों के प्रति बैंकों की उदासीनता को भी उजागर करते हैं। 2005-06 में एकदम बढ़ी शिकायतों की संख्या से बैंकिंग प्रावधानों में संशोधन की जरूरत महसूस हुई। 2006 में संशोधित स्कीम के दायरे में क्रेडिट कार्ड से जुड़ी शिकायतों को लाया गया है, साथ ही उपभोक्ता बैंक के विरुद्ध अपनी शिकायत ऑनलाइन भी दर्ज करवा सकते हैं। नए प्रावधानों के तहत बैंकों को सलाह दी गई है कि वे ग्राहकों की समस्याओं के प्रति उदासीन रवैया न अपनाएं। रिजर्व बैंक का इस कदम से बैंकों और उपभोक्ताओं के बीच न सिर्फ औपचारिक कम्युनिकेशन का रास्ता खुलेगा, बल्कि इससे बैंकों को उनकी सर्विस के प्रति ग्राहकों से अच्छा फीडबैक भी मिलेगा। रिजर्व बैंक ने बैंकों को यह सुनिश्चित करने की सलाह दी कि शिकायत रजिस्टर निर्धारित स्थान पर उपलब्ध हों जिससे उपभोक्ताओं को अपनी शिकायत दर्ज करने में दिक्कत न आए। साथ ही रिजर्व बैंक ने शिकायत निस्तारण के लिए समय सीमा निर्धारण के संबंध में भी बैंकों से पूछा। लेकिन मुझे यह जानकर आश्चर्य होता है कि कितने बैंक रिजर्व बैंक के निर्देशों का पालन कर रहे हैं? आरबीआई द्वारा बार-बार याद दिलाए जाने के बाद भी बैंकों का रवैया नहीं बदला है। ब्रांच स्तर पर भी बैंकों के शिकायत रजिस्टर मिलना मुश्किल है क्योंकि वे जानते हैं कि ऐसा करने से शिकायतों का अम्बार लग जाएगा। ग्राहकों की समस्याओं के त्वरित निस्तारण के लिए जरूरी है कि नियम बनाने के साथ उनका पालन करवाना भी सुनिश्चित किया जाए।ं

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  • Web Title: ग्राहकों के प्रति बैंकों का रवैया उदासीन