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तो शायद कालिदास लिखते ‘यमदूतम’

र्ज कीजिए कि महाकवि कालीदास पटना आ गए! ऐसा इसलिए कि बारिश और मेघ से उन्हें खास लगाव था, ऐसा कहते हैं। ऐसे में खासकर कवियों में महाकवि की तरह कॉलोनियों में महाकॉलोनी कंकड़बाग में उनके भ्रमण को लेकर कोई शक-सुबहा नहीं किया जा सकता। सवाल यह भी उठ सकता है कि पटना भ्रमण के बाद उनकी रचना क्या होती?ड्ढr ड्ढr ‘यमदूतम्’, ‘डेंजर गड्ढम्’ या ’स्लीप डिस्कम्’! हॉरबल सड़क और बरसाती पानी के संगम से पीड़ित पटनावासियों से यह सवाल पूछा जाए तो संभव है तीनों ऑप्शन वाली रचनाओं के लिए वे एसएमएस करंगे। महाकवि के मामले में यह कल्पना हो सकती है। पर, जो लोग इस शहर में खासकर बरसात में ‘रंगदार बने गड्ढों’ से त्राहि-त्राहि कर रहे हैं उनके नजरिए से तो यह सौ फीसदी हकीकत है। पटना को जल जमाव से मुक्ित दिलाने की योजना पर प्रोजेक्ट बने, काम शुरू हुआ लेकिन अमल होते-होते फिर बरसात आ गयी। जल निकासी के लिए जब सारा फामरूला फेल हो गया तो प्रशासन भी ‘डेंजर गड्ढम्’से प्रभावित होता दिखा।ड्ढr ड्ढr हाल के दस दिनों में जल निकासी व्यवस्था को दुरुस्त करने की दिशा में सड़कों का जो पोस्टमार्टम हुआ वह दर्दनाक है। मुहल्लों से जल निकासी के लिए मुख्य सड़क से जुड़ी सड॥कों को ही खोद दिया गया। जैसे उस रास्ते पर मनुष्यों के चलने से ही जल जमाव हो रहा हो। इसलिए न रहेगी सड़क और न चलेंगे लोग। भयानक सी दिखने वाली पाइप और मिट्टी के पहाड़ से आधी सड़क अतिक्रमित है। ऐसी स्थिति में घरों में पानी घुस आने की शिकायत करने से भी लोग कतराएं तो आश्चर्य नहीं। डर इस बात का भी तो है कि घर में जल जमाव की शिकायत की और निगम ने बेडरूम खोदना शुरू कर दिया तब कहां जाएंगे। कमोबेश पटना के बरसातपीड़ित हर मध्यमवर्गीय मुहल्लों का यही हाल है। न ढंग से गाड़ी चल सकती है और न साइकिल।

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