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दो टूक

यह वक्त ‘छोटी मछलियां’ पकड॥कर खुश होने का नहीं है। जाली करंसी के जिन धंधेबाजों को राजधानी की पुलिस ने पकड़ा है, वे मोहर भर हैं। अर्थव्यवस्था को तबाह करने के इस खतरनाक खेल के असली खिलाड़ी बहुत दूर बैठे हैं और उनकी गिरबां तक पहुंचना नामुमकिन नहीं, तो मुश्किल जरूर है। सच यह भी है कि झारखंड के गांव-शहर इस गैरकानूनी तिजारत के बड़े केंद्र बनते जा रहे हैं। नकली करंसी के सौदागरों का नेटवर्क लगातार पसर रहा है, लेकिन इसपर अंकुश के लिए कोई तंत्र खड़ा करने की दिशा में सोचा ही नहीं गया। नकली नोट खपानेवाले धंधेबाजों की पहुंच एटीएम और बैंकों के काउंटर तक है। बात तभी बनेगी, जब बड़े मगरमच्छों तक पहुंचा जाये। लेकिन इसके लिए बड़ी इच्छाशक्ित की जरूरत है।

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