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तमिलनाडु: सांसदों पर है गहरी नजर

अगले सप्ताह लोकसभा में विश्वासमत के सिलसिले में कांग्रेस हरसंभव पूरा समर्थन पाने के लिए दिन-रात एक कर रही है, पर तमिलनाडु में उसे कुछ असमंजस और अनिश्चितता का सामना करना पड़ रहा है। जिस डीएमके नीत डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव एलायंस (डीपीए) ने पिछले लोकसभा चुनाव में भारी बहुमत हासिल किया और कांग्रेस की झोली में राज्य की सभी 3सीटें डाल दी थीं, वह उतना शक्ितशाली नहीं रह गया है। डीएमके के पूर्व नेता वाइको के नेतृत्व वाला एमडीएमके डीपीए से अलग हो गया है। स्वयं डीएमके गंभीर अंदरूनी फूट से ग्रस्त है। यह फूट डीएमके नेता करुणानिधि के परिवार के भीतर पैदा हुई दरार का नतीजा है। मुख्यमंत्री करुणानिधि और दिल्ली में अपने अति-विश्वस्त प्रतिनिधि के तौर पर दयानिधि मारन एक-दूसर से अलग हो चुके हैं। गौरतलब है कि करुणानिधि व दयानिधि निकटस्थ रिश्तेदार भी हैं। अब तक उपलब्ध संकेतों के मुताबिक मनमोहन सरकार द्वारा विश्वास मत पाने के महत्वपूर्ण मौके के दौरान दयानिधि भाग नहीं ले सकते हैं। परिवार में इस फूट की जड़ में मारन-बंधुओं के मल्कियत वाले सन टीवी चैनल के कार्यक्रम हैं। इस चैनल ने ऐसी रिपोर्टे प्रसारित की हैं, जिनमें डीएमके की कुछ नीतियों पर सवालिया निशान लगाए गए हैं, भ्रष्टाचार के लिए यूपीए की आलोचना की है और एआईएडीएमके नेता जे. जयललिता के बयानों को अधिक महत्व दिया गया है। इसके अलावा, राज्य का वह इतिहास है, जिसमें मतदान के महत्वपूर्ण मौके पर कुछ सांसद गफलत में पड़ गए थे। एआईएडीएमके के सांसद सेदापति मुथैया 1में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के पक्ष में मतदान करना भूल गए थे। नवें दशक के मध्य में जब सदन में मत-विभाजन के लिए घंटी बजी तो उस वक्त डीएमके सदस्य एस.एस.राजेन्द्रन बाथरूम में थे। इसके चलते उन्होंने मतदान का मौका गंवा दिया। इस बार डीएमके ऐसी किसी भी परिस्थिति की पुनरावृत्ति नहीं चाहती। इस सिलसिले में उसने अपने सांसदों को लोकसभा में मतदान करने का प्रशिक्षण दिया है। वह सुनिश्चित करना चाहती है कि प्रधानमंत्री मनमोहन की सरकार को उसके सभी वोट हासिल हों। भारत-अमेरिकी परमाणु समझौते ने देश में राजनीतिक ध्रुवीकरण की प्रक्रिया को तेज किया है, जिससे वाममोर्चे को लाभ मिलने की संभावना बलवती हुई है। यूपीए सरकार से वामदलों के समर्थन वापस लेने के बार में माकपा की केंद्रीय समिति में पूर्ण, खुली और व्यापक बहस हुई है, जिसके चलते पार्टी के केरल तथा पश्चिम बंगाल वैचारिक धड़ों ने अपनी-अपनी क्षेत्रीय बाध्यताओं पर काबू पा लिया और इस मसले पर एकमत कायम किया है। इस घटनाक्रम का प्रमुख कारण पार्टी के भीतर मतभेद जमीनी राजनीतिक हकीकतों के कारण हैं, न कि बुनियादी वैचारिक कारणों से। साथ ही, परमाणु समझौते ने यूपीए के साझीदार- कांग्रेस और उसको बाहर से समर्थन देने वाले वामदलों की ताकत व कमजोरियों को मुख्य फोकस में ला दिया है। जिस व्यवस्था की ताकत पर चार साल से अधिक समय तक यूपीए सत्ता में रह पाया, वह यह है कि दोनों पक्षों ने माना कि अगले आम चुनाव से पहले उनका एक औपचारिक अलगाव जरूरी है। इसके लिए अमेरिका के साथ परमाणु समझौता ने एक सटीक वैचारिक मुद्दा प्रदान कर दिया है। जहां तक अगले लोकसभा चुनाव के बाद उनके फिर हाथ मिलाने की जरूरत का सवाल है, दोनों ने एक-दूसरे पर आरोप लगाने से लगभग परहेा किया है। यूपीए चेयरमैन और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने गठबंधन सरकार को अब तक समर्थन देने के लिए वामदलों को धन्यवाद दिया है। यूपीए सरकार चलाने में कमजोरी यह रही है कि केंद्र में कांग्रेस ने अपने नेतृत्व में पहली बार गठबंधन सरकार का गठन किया था और उसे इस तरह चलाया, जसे वह उसकी अपनी सरकार हो। इस दौरान वामदल सदैव वैचारिक गोला-बारूद के साथ आलोचनात्मक मुद्रा में रहे और इस बात पर जोर दिया कि वह उनकी कुछ नीतियां लागू कर। परमाणु समझौते के मामले में भी अमेरिका के साथ सहयोग के प्रति वामदलों के तीव्र विरोध को कांग्रेस ने नजरअंदाज किया । सरकार बचाने के लिए कांग्रेस ने लोकसभा में समर्थन के लिए समाजवादी पार्टी (सपा) का दामन थामा है। दूसरी तरफ, माकपा ने उत्तर प्रदेश में सपा की प्रतिद्वंद्वी बसपा से हाथ मिलाया है। यह नया घटनाक्रम पारस्परिक रूप से दोनों पक्षों के लिए लाभकारी साबित हो सकता है। उत्तर प्रदेश में वामपंथियों की उपस्थिति अत्यंत सीमित है और बसपा से मैत्री के जरिए उनकी स्थिति सुधर सकती है। इस समझ के साथ बसपा सुप्रीमो और उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती का कद और सम्मान बढ़ेगा। आय से अधिक संपत्ति के मामले में दो मुख्य वामदल- भाकपा और माकपा ने हाल ही में मायावती का बचाव किया है। लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं।ं

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