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दो टूक

एक मुद्दत का इंतजार आखिरकार खत्म हुआ। शंकर की जटा की तरह उलझी सरकारी फाइलों से पुनर्वास एवं पुनस्र्थापन नीति की गंगा जमीन पर उतर आयी है। उम्मीद की जानी चाहिए कि अब इस गंगा की धारा से औद्योगिक विकास की योजनाओं को नवजीवन मिलेगा। दर्जनों एमओयू के बावजूद राज्य में औद्योगिक इकाइयां लगाने का काम सिर्फ इसी नीति की कमी की वजह से शुरू नहीं हो पा रहा था। अच्छी बात यह है कि पुनर्वास नीति में न्यूनतम विस्थापन के संकल्प के साथ-साथ प्रभावितों के हितों का खयाल रखा गया है। झारखंड की आबादी हमेशा जल, जंगल, जमीन के सवाल पर बेहद संवेदनशील रही है। एसे में एक बेहतर नीति की जरूरत शिद्दत से महसूस की जा रही थी। लेकिन सबसे जरूरी है साफ-सुथरी नीयत के साथ इसे जमीन पर उतारा जाये।

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