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इलाज के दो चेहरे

दिल्ली में एक साथ सुर्खियां बनीं दो खबरें ठीक एक-दूसरे के विपरीत हैं और वे अस्पतालों में इलाज के दो चेहरे उाागर करती हैं। एक में सड़क दुर्घटना के दौरान 23 वर्षीय सुप्रतिम की छाती के निचले हिस्से में पांच फुट से अधिक लंबी लोहे की रॉड आर-पार घुसने के बावजूद डॉक्टरों द्वारा उसे बचा लिया गया दूसरी दुर्घटना में घायल 8वीं कक्षा के छात्र हरप्रीत को समय पर खून व अन्य जरूरी इलाज नहीं मिला, जिससे घर का चिराग बुझ गया। भाग्यवादी लोग इसे किस्मत का फेर कहेंगे, पर हकीकत में ऐसा नहीं है। सुप्रतिम की तरह यदि हरप्रीत को भी समय पर इलाज व खून मिलता तो उसकी जान बच सकती थी। सुप्रतिम का मामला इस मायने में हैरतअंगेज है कि लोहे की रॉड शरीर के आर-पार चली जाए तो जान बचना नामुमकिन-सा हो जाता है। निश्चय ही उसके हौसले की दाद देनी होगी कि होश खोए बगैर उसने अपने परिवार, दोस्तों व रिश्तेदारों को मोबाइल से दुर्घटना की सूचना दी और उसे एम्स के ट्रामा सेंटर में पहुंचाया। अब अस्पताल और डॉक्टरों के कड़े इम्तिहान की बारी थी। कुछ समय से यह ट्रामा सेंटर अपनी बदइंतजामी के लिए बदनाम रहा है, पर तमाम जटिलताओं के बावजूद सर्जन डॉक्टरों की टीम ने बेहद कुशल तरीके से रॉड निकालकर सुप्रतिम की जान बचा ली। चाहे सरकारी या निजी अस्पताल हों, देश में कुशल विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी नहीं है। व्यवस्थागत खामियों और ढांचागत सुविधाओं के अभाव के चलते कई मरीा दम तोड़ देते हैं। आबादी बढ़ने के साथ देश की सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं का पर्याप्त विस्तार नहीं हुआ है। इसी कारण निजी अस्पताल मरीाों से मनमानी फीस वसूल कर चांदी कूट रहे हैं, जहां गरीबों के लिए मेडिकल सुविधाएं पाना एक सपना भर बन गया है। सरकारी अस्पतालों की बेरुखी के कारण हरप्रीत जान से हाथ धो बैठा, जबकि इसी तरह के अन्य अस्पताल में यथोचित सुविधाएं-सेवाएं मिलने से सुप्रतिम बच गया। उसकी जान बचना ईश्वरीय चमत्कार या करिश्मा नहीं, बल्कि समय रहते चिकित्सीय सुविधाओं की उपलब्धता का कमाल कहना उचित होगा।

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