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हिन्दू-मुस्लिम रिश्तों पर चार नजरिए

हाल ही में मैंने एम.एस. गोलवलकर के भाषणों का संग्रह ‘बंच ऑफ थाट्स’ पढ़ा। यह किताब 1में बेंगलूर से प्रकाशित हुई थी। गोलवलकर लंबे समय तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक रहे। उस संगठन के जिसका भारत के आधुनिक इतिहास में खासा प्रभाव रहा है। किताब के परिशिष्ट में उनके 1े एक भाषण का जिक्र है जिसमें वे कहते हैं, ‘हम जिसमें भी विश्वास करते हैं, मुसलमान उसके विरोधी हो जाते हैं। हम मंदिर में पूजा करते हैं, वे उसे अपवित्र करते हैं।हम गाय की पूजा करते हैं, वे उसे खाते हैं। अगर हम औरत को पवित्र मां का प्रतीक मानते हैं, तो वे उसकी इज्जत से खिलवाड़ करते हैं। वे धार्मिक, सांस्कृतिक और समाजिक रूप से हमारी जीवन-शैली का हर तरह से विरोध करते हैं। वे मान बैठे हैं कि शत्रुता ही मूल है।’ उन्हें पढ़कर मुझे याद आया कि दूसरे पाले में बैठे कट्टरपंथी ने इससे ठीक 16 साल पहले क्या कहा था। मार्च 10 में लाहौर में मुस्लिम लीग का सालाना जलसा हुआ था। मुहम्मद अली जिन्ना ने यहां अध्यक्षीय भाषण दिया था। वहां उनका तर्क था, ‘भारत में समस्या अंतर-सांप्रदायिक नहीं है, यह एक तरह से अंतरराष्ट्रीय चरित्र से जुड़ी है और इसका समाधान भी इसी तरह होना चाहिए। यह बस एक सपना ही है कि हिंदुओं और मुसलमानों को अपनी एक समान राष्ट्रीयता बनानी होगी। यह एक भ्रम है कि भारत की एक समान राष्ट्रीयता होगी, यही सारी समस्याओं की जड़ है। और अगर हम अपने तौर-तरीकों को समय रहते नहीं बदल सके तो यह भ्रम भारत को तबाह कर देगा। हिन्दू और मुसलमान के मजहबी फलसफे अलग हैं, उनकी सामाजिक परंपराएं अलग हैं, उनका साहित्य अलग है। उनमें रोटी-बेटी का संबंध नहीं होता। वे दो अलग-अलग सभ्यताओं के लोग हैं। उनकी सोच और समझ एक दूसर की विरोधी है। जिंदगी का उनका नजरिया भी अलग-अलग है।’ जिन्ना 10 में और गोलवलकर 1में दोनों ही यह मानते थे कि हिन्दू हिन्दू है और मुसलमान मुसलमान। ये दोनों कभी मिल नहीं सकते। ये दोनों ही महानुभाव मानते थे कि उनका नजरिया, उनकी मानसिकता, उनका इबादत और जीने का तरीका इतना अलग है कि वह उन्हें शांति के साथ एक साथ जीने नहीं दे सकता। दूसर शब्दों मे कहें तो ये दोनों ही समुदाय दो अलग राष्ट्र हैं। हिन्दू और मुसलमान के रिश्तों की इन व्याख्याओं का सबसे जोरदार विरोध महान कांग्रेसी नेता मौलाना अबुल कलाम आजाद करते थे। जिन्ना के लाहौर वाले मुस्लिम लीग जलसे के भाषण से ठीक एक हफ्ते पहले बिहार के रामगढ़ कस्बे में कांग्रेस की एक सभा हुई थी। इसकी अध्यक्षता करते हुए आजाद ने कहा था, ‘यह तो हिन्दुस्तान की ऐतिहासिक फितरत है कि यहां मानव जाति की कई संस्कृतियां एक साथ रहती हैं। कई संस्कृतियों ने इसकी जमीन को अपना बसेरा बनाया। कई कारवां यहां रुके और यहीं रह गए। हिन्दुस्तान में हिंदुओं और मुसलमानों के 11 सौ साल के साझा इतिहास की कई उपलब्ध्यिां हैं। हमारी जबान एक जसी है, हमारी शायरी एक जसी है, साहित्य एक जसा है, हमारी संस्कृति, हमारी कला, हमारी वेशभूषा, हमारे व्यवहार, हमारी परंपराएं, रोाना की जिंदगी की न जाने कितनी ऐसी चीजें हैं, जिन पर हमारी साझा मुहर लगी है। हाारों साल के इस साझा जीवन ने हमें एक ही साझा राष्ट्रीयता के सांचे में ढाल दिया है- अब यह हमें अच्छा लगे या न लगे। अब हम एक भारतीय राष्ट्र हैं- एकताबद्ध और अलग न हो सकने वाले। कल्पना की कोई भी उड़ान या कोई भी षड्यंत्र हमें तोड़कर अलग अलग नहीं कर सकता।’ इतिहासकार की नजर से देखें तो इसमें कौन-सा नजरिया सच्चा है? क्या जिन्ना और गोलवलकर सही थे कि हिन्दू और मुसलमान एक साथ शांति से नहीं रह सकते? या मौलाना आजाद सही थे जो यह मानते थे कि ये दोनों ही धारणाएं पूरी तरह गलत हैं और हिन्दू-मुसलमान दोनों ही सदियों से एक साथ रह रहे हैं और दोनों ने एक साझा राष्ट्रीयता को विकसित कर लिया है? ऐतिहासिक दस्तावेज बताते हैं कि सच पर किसी का एकाधिकार नहीं है। अतीत में हिंदुओं और मुसलमानों के रिश्ते मुहब्बत के रहे हैं और नफरत के भी रहे हैं। उनमें आपसी सहयोग और भाईचारा भी रहा है और दुश्मनी भी। ऐसे भी दौर रहे हैं जब हिन्दू और मुसलमान एक-दूसरे से लड़ते-झगड़ते रहे और ऐसे दौर भी रहे जब दोनों एक साथ राजी-खुशी रहे। भारतीय संस्कृति के कई पक्ष ऐसे हैं जसे कि शास्त्रीय संगीत जिस पर दोनों की साझा कोशिशों की मुहर लगी है, लेकिन वहीं दूसरी तरफ वे सदियों से एक ही सरामीं पर रह रहे हैं, इसके बावजूद उनमें आपस में रोटी-बेटी का संबंध नहीं होता। कट्टरपंथी जब यह कहते हैं कि हिंदू और मुसलमान एक दूसर के दुश्मन के रूप में ही रहते हैं तो वे पूरी तरह गलत होते हैं, लेकिन ठीक वहीं पर जब दोनों की साझा संस्कृति से उपजे भावुक राष्ट्रवाद की बात होती है तो भी सच का सरलीकरण कर दिया जाता है। आजाद भारत में ये सारी बातें बेमतलब हो जानी चाहिए कि हमारे इतिहास में हिन्दू-मुसलमानों के आपसी रिश्ते कैसे रहे। जवाहर लाल नेहरू ने अक्तूबर 1में कहा था, ‘हमार देश में मुसलमान अल्पसंख्यक हैं, लेकिन संख्या में वे इतने ज्यादा हैं कि अगर वे चाहें भी तो भी कहीं और नहीं जा सकते। यह वह मूलभूत तथ्य है, जिस पर कोई बहस नहीं हो सकती। पाकिस्तान कितना भी भड॥काए, गैर मुसलमानों की वहां जितनी भी बेइज्जती की गई हो, उन पर जो भी अत्याचार हुए हों, हमें अपने इन अल्पसंख्यकों से सभ्य समाज की तरह ही व्यवहार करना होगा। लोकतांत्रिक देश में हमें उन्हें सुरक्षा और नागरिक के सार अधिकार देने ही होंगे।’ यहां जो चार नजरिये पेश किए गए हैं उनमें सबसे आखिरी सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। अकबर और औरंगजेब के शासनकाल में इस देश में चाहे जो कुछ भी हुआ हो, या न हुआ हो। सऊदी अरब या पाकिस्तान में आज चाहे जो कुछ भी हो रहा हो। भारतीय गणराज्य हर भारतीय को समान अधिकार देता है, उसका धर्म या आस्था चाहे जो भी हो। यही वह मूलभूत तथ्य है जिस पर कोई बहस नहीं हो सकती। लेखक प्रसिद्ध इतिहासकार हैं।

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