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बुरा मानो या भला : सेक्यूलर देश में सरकार का धम

वह देश जो खुद को सेक्युलर कहता हो, उसे धार्मिक मसलों में टांग नहीं फंसानी चाहिए। तीर्थयात्रियों की हिफाजत और सहूलियतों को जरूर देखना चाहिए। जसाकि हमारी राज्य सरकारें इलाहाबाद के कुंभ मेलों और पुरी की जगन्नाथ रथयात्रा वगैरह में करती हैं। सरकारी अधिकारियों को धार्मिक संस्थाओं से कोई लेना-देना नहीं होना चाहिए। न बढ़ावा देने की कोशिश करनी चाहिए। न किसी सरकारी जगह को उन्हें देना चाहिए। न ही कोई जमीन-ाायदाद और पैसा मुहैया कराना चाहिए। यह गलती जम्मू-कश्मीर के रिटायर्ड राज्यपाल जनरल एस. के. सिन्हा ने की। उन्हें जंगल की वह जमीन अमरनाथ श्राइन बोर्ड को नहीं देनी चाहिए थी। एक तजुर्बेकार प्रशासक होने के नाते उन्हें अंदाज होना चाहिए था कि उनका यह कदम मुस्लिम बहुसंख्यक घाटी में बवाल करगा। और बवाल हुआ। उनके बाद राज्यपाल बने एन.एन. वोहरा ने जाते ही बिल्कुल सही कदम उठाया। उन्होंने उस ऑर्डर को ही बदल दिया। इसके साथ ही उन्होंने तीर्थयात्रियों को सुरक्षा और सुविधाओं का भरोसा दिलाया। यह अलग बात है कि जम्मू और देशभर में उन्हें हिंदुओं के गुस्से को झेलना पड़ा। उससे हिंदूवादी राजनीतिक पार्टियों को एक मुद्दा भी मिल गया। वह उसका चुनावी फायदा उठा सकते हैं। ऐसी गलतियां फिर नहीं होनी चाहिएं। अब वक्त आ गया है कि हमें मक्का-मदीना को जानेवाले हा यात्रियों को देनी वाली सहूलियतों पर भी सोचना चाहिए। इस्लाम में साफतौर पर माना जाता है कि उन्हीं लोगों को हा करना चाहिए, जो उसका खर्चा उठा सकें, लेकिन अपनी सरकार तो हा यात्रियों को सब्सिडी देती है। फिर मुसलमानों का एक प्रतिनिधिमंडल सऊदी अरब भेजती है। वह भी बिल्कुल सरकारी खर्चे पर। इस तरह की कवायद की कोई जरूरत नहीं है। मैं जानता हूं कि ज्यादातर मुसलमान उसके खिलाफ हैं। अगर उस सब्सिडी को हटा लिया जाता है तो वे उसका स्वागत करंगे। हाल के तजुर्बो से एक सबक तो मिलता है। जो सरकार धार्मिक मसलों में हाथ डालती है, अपनी उंगलियां ही जलाती है। मेरा दोस्त मीनूड्ढr उन लोगों के लिए एक बुरी खबर है, जो हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच पुल बनाना चाहते हैं। उस पुल के लिए जबर्दस्त काम करने वाले मीनू भंडारा नहीं रहे। 70 साल के मीनू पाकिस्तान की नेशनल असेंबली के सदस्य रहे थे। वह चीन गए थे। वहां कार हादसे में बुरी तरह घायल हो गए। उन्हें रावलपिंडी लाया गया। सबसे पहले उनका हालचाल लेने पहुंचने वालों में राष्ट्रपति मुशर्रफ और उनकी बीवी साहेबा थीं। एक बार तो लगा कि उनकी हालत सुधर रही है, लेकिन 15 जून को उन्होंने हार मान ली। मुझे याद नहीं है कि पहले-पहल मैं उनसे कहां और कब मिला था? असल में हमारी दोस्ती के बीच मंजूर कादिर थे। मैं मानता था कि मंजूर अच्छाई, सच्चाई और खरपन की जीती-ाागती तस्वीर थे। मीनू मुझसे सहमत थे। मुझे याद है कि उनसे पहली ही मीटिंग में मैंने पूछा था, ‘क्या आप बाबाजी हैं?’ उन्हें उस लफ्ज का मायने ही नहीं पता था। मैंने ही बताया था कि हिन्दुस्तान में पारसियों को बाबाजी कहा जाता है। मेरा अगला सवाल था कि वह पाकिस्तान में क्या कर रहे हैं? उन्होंने तफसील से बताया था कि वह मेरी ब्रेवरी चलाते हैं और नेशनल असेंबली के सदस्य हैं। हम दोस्त बन गए थे। वह अक्सर दिल्ली आते थे। मेर साथ उन्होंने कई शामें बितायीं। वह अपनी बनाई चीजों को फ के साथ देखते थे। उनकी माल्ट ह्विस्की कमाल की थी। मीनू अक्सर किसी खूबसूरत लड़की के साथ आते थे। वह लेखिका, पेंटर वगैरह कुछ होती थी। मशहूर पाकिस्तानी लेखिका बाप्सी सिधवा उनकी बहिन थीं। यह काफी बाद में पता चला। बाप्सी जब भी दिल्ली आती मेर साथ ही रुकती थी। मैं जब भी पाकिस्तान गया, मीनू के घर ही रुका। रावलपिंडी में उसका बेहद खूबसूरत बंगला था। अपने मुस्लिम कर्मचारियों के लिए उन्होंने एक मसिद भी बनवाई थी। मैंने एक बार पूछा कि मुसलमान तो शराब को हराम मानते हैं। वह तुम्हारे बिजनेस को कैसे चलने देते हैं। उन्होंने हंसते हुए कहा था, ‘आप तो जानते हैं हमारे यहां का हाल। कहो कुछ करो कुछ। मेरी चीजें तो एक्सपोर्ट के लिए हैं, लेकिन बंद दरवाजों के पीछे हमार इलीट उसका मजा लेना चाहते हैं।’ मीनू की पहली पसंद सियासत नहीं, बल्कि साहित्य था। वह सियासत के तमाम जवाब दे देते थे, लेकिन बात करना चाहते थे किताबों की। दिल्ली में वह अक्सर इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में ठहरते थे। दोपहर उनकी खान मार्किट में किताबें ढूंढ़ते बीतती थी। मेर लिए मीनू का जाना एक हादसा है। लाहौर के दिनों के मेरे तमाम दोस्त अब कब्रों में हैं। पाकिस्तान को मैं अपना ‘वतन’ कहता हूं। वह उसकी आखिरी कड़ी थे।ं

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