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दूसरों की सरकार बनाने-बचाने का इतिहास है झामुमो के नाम

सियासत में झामुमो एक बार फिर छाया है। दिल्ली में भी झामुमो की अहमियत रही है और राज्य में भी सरकार को समर्थन देने के सवाल पर झामुमो का भाव रहा है। इसी में होता है तोल-मोल का खेल। इस बार राजनीतिक परिदृश्य कुछ अलग किस्म का है। यूपीए का घटक दल होते हुए भी झामुमो प्रमुख शिबू सोरन कांग्रेस को गिनती का अहसास कराने में लगे हैं।ड्ढr दरअसल सरकार बचाने-बनाने में झामुमो का इतिहास रहा है। फर्क इतना भर है कि अलग राज्य गठन के बाद (15 नवंबर 2000) झामुमो प्रमुख शिबू सोरन गद्दी हासिल नहीं कर सके। फिर 2005 में यूपीए के समर्थन से शिबू की सरकार तो बनी, लेकिन नौ दिन में ही सत्ता हाथ से निकल गयी। 1में केंद्र में नरसिम्हा राव की सरकार बचाने में झामुमो की भूमिका रही थी। रिश्वतखोरी का आरोप भी लगा था। उस समय झामुमो में छह सांसद थे। एकीकृत बिहार में लालू प्रसाद के साथ झामुमो की दोस्ती और सरकार को समर्थन देने का भी एक लंबा सफर रहा है। बाद में अलग राज्य के सवाल पर झामुमो की लालू प्रसाद से अनबन भी हुई। मोरचा ने लालू प्रसाद से नाता भी तोड़ा। झामुमो में दो गुट बन गया। एक गुट से लालू ने नजदीकी भी बना ली। 2000 में झामुमो ने नीतीश कुमार को समर्थन दिया। नीतीश सरकार में झामुमो कोटा से स्टीफन मरांडी ने मंत्री पद की शपथ भी ली, लेकिन नीतीश कुमार बहमुत साबित नहीं कर सके। 15 नवंबर 2000 को झारखंड राज्य का गठन होने के बाद से झामुमो यूपीए फोल्डर में है। 2004 का लोस चुनाव भी झामुमो ने यूपीए फोल्डर में ही लड़ा।

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