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सर्विस सेक्टर को बचाने के लिए लामबंदी

जिनीवा में चल रही डब्ल्यूटीओ मिनी मिनिस्टीरियल का नतीजा कुछ भी हो, लेकिन भारत सेवा व्यापार के मामले में अमेरिकी अथवा यूरोपीय संरक्षणवाद का कड़ा विरोध कर रहा है। इस संरक्षणवाद के तहत तमाम गैर-शुल्क बाधायें (नॉन-टैरिफ बैरियर) मौजूद हैं। इसका खामियाजा भारत के लाखों पेशेवरों और अर्थव्यवस्था को भुगतना पड़ रहा है। वाणिज्य मंत्री कमलनाथ की अगुआई में भारत इस बात की लामबंदी में जुटा है कि ऐसी बाधाओं को पूरी तरह से समाप्त किया जाये ताकि घरलू पेशेवरों की बेरोकटोक विकसित देशों के बाजारों तक पहुंच कायम हो और यही नहीं, घरलू स्तर पर भी बीपीओ जसे उद्योगों के फलने-फूलने का रास्ता साफ हो जाये। भारत ने मांग की है कि वे अपने यहां विभिन्न क्षेत्रों के भारतीय पेशेवरों को मुक्त रूप से काम करने के मौके दें और इनमें सुरक्षा, वीजा अथवा अन्य कोई घरलू नियम कानून की आड़ में गैर-शुल्क बाधायें न खड़ी करं। दूसरे, विकसित देशों की सरकारं अपनी कंपनियों पर संरक्षणवादी अंकुश न लगायें कि उन्हें भारत जसे देशों से अपने तमाम कामों को कराने की प्रक्रिया यानी आउटसोर्सिग बंद करनी पड़े। इस प्रकार की आउटसोर्सिग बीपीओ के जरिए होती है। इसे बिजनेस प्रोसेस आउटसोर्सिग कहा जाता है लेकिन डब्ल्यूटीओ समझौते में इसे रिमोट सप्लाई ऑफ सर्विसेस कहा जा रहा है। अमेरिका जसी उदार अर्थव्यवस्था में बार-बार घरलू संरक्षणवाद सिर उठा रहा है और कंपनियों को लागत कम करने के नाम पर काम के आउटसोसिंग को रोगार के निर्यात की संज्ञा दी जा रही है।ड्ढr भारत इस अड़चन को डब्ल्यूटीओ के जरिए हमेशा के लिए रफा-दफा कर देना चाहता है जबकि विकसित देश ऐसा दायित्व लेने से कन्नी काट रहे हैं। भारत का जोर प्रमुख रूप से स्वास्थ्य, शोध एवं विकास, इांीनियरिंग, शिक्षा, निर्माण, सूचना प्रौद्योगिकी जसी सेवाओं पर है। अगर भारत को जिनीवा में कामयाबी मिली तो भारत पेशेवरों की मुक्त आवाजाही के जरिए उनके कौशल यानी स्किल का निर्यात कर सकेगा। देश के कुल निर्यात में सेवा व्यापार की हिस्सेदारी 40 फीसदी है। देश का सेवा निर्यात लगभग 86 अरब डॉलर पर पहुंच चुका है। सकल घरलू उत्पाद (ाीडीपी) में सेवा क्षेत्र की हिस्सेदारी 55 फीसदी से अधिक हो चुकी है। एक अनुमान के मुताबिक देश में 14.2 करोड़ पेशेवर हैं जो देश के कुल कामगरों का लगभग 28 फीसदी हैं।ड्ढr ं

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